Wednesday, November 26, 2025

पैसा

 

पैसा बहुत जरुरी है ,

नितांत जरुरी है ,

जो कहते है - मोहमाया है ,

ये कहने के लिये भी ,

पल्ले में पैसा जरुरी है। 

 

जो कहते है ,

पैसा सब कुछ नहीं है ,

कपट झूठ बोलते है ,

ऐसा कहने के लिये ,

वो भी पैसा लेते है।

 

अर्थ के बिना ,

जीवन जीना अनर्थ है ,

हाँ , इक बार पैसा आ जाये ,

फिर ज्ञान देने का ,

अलग अर्थ है।  

 

पैसा भले ही शांति ,

सुकून की गारंटी न दे ,

मगर वो सब कुछ दे सकता है ,

जो आज के लिए जरुरी है,

जरुरत पूरी करने के लिये ,

पैसा कमाना मजबूरी हैं। 

Sunday, November 23, 2025

जेन ज़ी कविता

 

बातों ही बातों में कल मेरी बेटी बोली ,

पापा अब नई कवितायें लिखनी होगी ,

वैसे भी हमारी जेनेरशन कवितायें पढ़नी भूल रही ,

उनके हिसाब से अब लिखनी होंगी।

 

मन विचलित, मस्तिष्क परेशान ,

कहाँ से लाऊँ अब ये ज्ञान ,

मगर अब जुड़ना होगा तो ,

इस दौर की कवितायें लिखनी ही होंगी।

 

लगे हाथ उसने दे दिया एक सुझाव ,

आई का इस्तेमाल करो ,

प्रोम्प्ट देकर उससे अब ,

अपनी कवितायें रचने को कहो।

 

अब कवितायें भी आई लिख देगा ,

कवियों अब तुम्हारा क्या होगा ,

मानवीय संवेदनाओ को अब ,

आई अपने कृत्रिम भावों से सीचेंगा।

 

एक ही प्रोम्प्ट पर अलग -अलग रस की ,

वो झटपट नौ कवितायें रच  देगा ,

" आनन्द " तुम खेती करना सीखो अब ,

कवितायें तो तुमसे बेहतर आई लिख देगा।

Saturday, November 15, 2025

बूढ़ी अम्मा

 

पहाड़ सी ज़िन्दगी हो गयी ,

सब कुछ होते हुए भी कुछ न था ,

सब छोड़कर अकेले उसे ,

पहाड़ ही कर गए थे। 

 

जिद्दी अम्मा भी थी ,

कितना समझाया था उसे ,

चली जा तू भी वही ,

न जाने क्यों पहाड़ों से इतना लगाव था। 

 

हिस्से उसके संघर्ष के क्या आया था ,

रोज़ पहाड़ जैसी मुसीबतें ,

उकाव -हुलार चढ़ते -उतरते ,

हाथों से लकीरें भी गायब थी। 

 

अम्मा रोज़ डूबते सूरज को ,

हुक्का पीते हुए निहारती थी ,

आज रात ही निकल जाये प्राण ,

अगले दिन खेतों में मिलती थी। 

 

अपने बाड़ -खुड़ों से उसे अथाह प्रेम था ,

किसी में पालक , किसी में प्याज ,

नन्ही -नहीं क्यारियों में कपोल फूटती थी ,

अम्मा मन ही मन संतुष्ट होती थी। 

 

लौकी और गद्दुऐ सूखा रखे थे घर की छत पर,

 पीली ककड़ियों  की बड़िया बनाती थी ,

खुद का कल का पता नहीं था ,

पूरे ह्यून बिताने का इंतजाम करती थी। 

 

एक दिन सच में रात को सोई ,

सुबह उठी ही नहीं ,

बड़िया छत में ओंस में भीग गयी ,

और पालक तुश्यार से मुरझा गयी। 

 

अम्मा चुपचाप चली गयी ,

और सब कुछ छोड़ गयी ,

बच्चे भी अम्मा की चिंता से फरांग हो गये ,

गाँव वालों ने कहा - बुढ़िया तर गयी। 

 

Friday, November 14, 2025

लोकतंत्र में चुनाव


प्रतिनिधि चुनना है , 

जो काम आये लोगों के ,

जो सरकार से बात करे , 

सरकार में शामिल होकर , 

जो जान सके दुःख दर्द , 

जो नब्ज पकड़ सके वक्त -बेवक्त , 

वही जीतना चाहिये , 

उसी को जीताना चाहिए , 

यही है लोकतंत्र का , 

सबसे बड़ा मूलमंत्र , 

अब चुनाव में , 

कौन जीतता है ? 

कौन हारता है ? 

इसके बहुत से है कारक , 

जनता तो उसे ही चुनेगी , 

जिससे लगेगा , 

वक्त पर सुनेगा बात , 

वर्ना जनता तो अपना दुखड़ा , 

रो ही रही है सालों से , 

सुनता कौन है ? 

एक बार चुनाव जीतकर , 

मगर लोकतंत्र की तो आत्मा बसी है चुनावों पर , 

होते रहेंगे जनता से , जनता के लिये , जनता द्वारा , 

जायेंगे सरकार में चुने हुए उम्मीदवार , 

अब उनपर निर्भर , 

कितना अनसुना करेंगे , कितना सुनेंगे , 

आयेंगे फिर लौट कर, 

फिर कहाँ जायेंगे बचकर।  

Saturday, November 1, 2025

संघर्ष

 

यकीन जानिये ,

संघर्ष सबकी ज़िन्दगी में है ,

वो बात अलग है ,

सबके संघर्ष का स्तर अलग -अलग है। 

 

कोई संघर्ष से निखरता है ,

कोई संघर्ष से बिखरता है ,

कोई टूट जाता है ,

कोई नई परिपाटी गढ़ जाता हैं। 

 

बिना संघर्ष के जो पाता है ,

उसे क्या पता स्वाद संघर्ष का ,

भुरभुरा सा ज़िन्दगी भर ,

इक नन्ही ठोकर से बिखर जाता हैं। 

 

जो खड़ा रहता है संघर्षो में सीना तान ,

फिर उसके लिए क्या आँधी -तूफ़ान ,

तैयार हर परिस्थिति के लिये ,

शून्य से फिर खड़ा कर देता है मुकाम। 

 

जो बाधाओं से लड़ता है ,

जो संघर्षो में तपता है ,

वही निखर कर इक दिन ,

जग में "हीरे" सा दमकता हैं। 

 

डटा रहा अंतिम समय तक ,

वक्त तेरे लिये फिर थम जायेगा ,

तेरे जूनून की जिद्द में ,

जमीन क्या आसमां भी झुक जायेगा।