Sunday, March 19, 2017

चलो , देश बदलते हैं



चलो , देश बदलते हैं , 
थोड़ा हम और थोड़ा दुसरो को बदलते हैं। 

मंद गति से चल रही विकास यात्रा को , 
आओ ढाई सौ अरब हाथो से थोड़ा धक्का लगाते हैं, 
चलो  , देश बदलते हैं। 

हम सब पहले भारतवासी हैं , 
जात -पात - धर्म- ऊँच - नीच  की राजनीति से थोड़ा ऊपर  उठते हैं , 
चलो , देश बदलते हैं।  

जो पिछड़े , अशिक्षित , गरीब हैं , 
उनको सब मिलकर ऊपर उठाते हैं , 
चलो  , देश बदलते हैं। 

जो जहाँ हैं , वही से शुरू करते हैं , 
अपना काम मेहनत और  ईमानदारी से करते हैं , 
चलो , देश बदलते हैं।  

क़र्ज़ बहुत बड़ा हैं देश का सब पर , 
थोड़ा इस क़र्ज़ को कम करते हैं , 
चलो , देश बदलते हैं।

कराह रही अपनी भारत माता के, 
चेहरे पर मुस्कान लाते हैं , 
चलो , देश बदलते हैं।  

Friday, March 17, 2017

ये चुनाव कुछ कहते हैं



उत्तर में भगवा लहराया , 
गोवा में थोड़ा सा कमल मुरझाया , 
मणिपुर में कमल शुरुवात हुई , 
पंजाब ने हाथ पर भरोसा जमाया।  

मोदी लहर ने फिर दिखाया कमाल , 
पंक्चर हुई "साइकिल" - "हाथ" हुआ लाल, 
"हाथी" की बदल गयी चाल , 
बाकियो का किसी ने न पूछा हाल।  

सारे मिलकर मंथन कर रहे हैं , 
हार का दोष अब एक दूसरे पर  मढ़  रहे हैं , 
कई  ई वी एम् को शक से देख रहे  हैं ,
अपनी कथनी  करनी कोई देख नहीं रहे हैं।  

मतदाता फिर से चुपचाप हो गया हैं , 
नेताओ को सबक सीखा दिया हैं , 
पांच साल बाद ही अब जागेगा , 
किस्मत अपनी नेताओ को देकर अपने काम में लग गया है।  

Friday, February 17, 2017

मतदान बाद , गणना से पहले



नींद उडी हैं नेताओ की , 
ई वी एम  में बंद हो गयी किस्मत।  

कुछ अब सोच रहे जीत गए तो कैसे कमायेंगे ? 
हार गए तो पाँच साल कैसे बितायेंगे ? 

बड़ी कशमकश चल रही हैं , 
ज़िन्दगी नीरस सी लग रही हैं।  

वादों -इरादों के पोस्टरों को जला  दिया हैं , 
अब किसी के हाथ न पड़े , छुपा दिया हैं।  

हर मतदाता को शक की निगाह से देख रहे हैं , 
लिया तो इन्होंने  मुझसे से हैं , वोट पता नहीं - किसे दिया हैं ? 

नेताजी के कट नहीं रहे दिन रात , 
चेले अब भी दिलासा दे रहे हैं - जीतोगे बस आप।  

नेता जी ने अब विपक्षी उम्मीदवारों से भी दोस्ती कर ली हैं , 
अपने भाषणों में उसकी खिल्ली पर माफी माँग ली हैं।  

समझौता हो गया है - तुम जीते तो हमारा भी काम करना , 
हम जीते तो तुम हमें अपना भाई ही समझना।  

दोनों अब साथ साथ कहकहे लगाते हैं , 
चेले दोनों के साथ में अब पार्टी उड़ाते हैं।  

इन्तजार में दिन कट रहे हैं , 
ख्याली पुलाव रोज़ बन रहे हैं।

एक दिन का राजा - मतदाता ,
अपने काम धंधे , रोज़ी रोटी के जुगाड़ में लग जाता हैं।  

Wednesday, January 4, 2017

देश जगना चाहिये , देश चलना चाहिए

 हर स्तर पर प्रयास होना चाहिए ,
देश आगे बढ़ना चाहिए।  

चलो - उठो - भारत निर्माण करना हैं , 
हर हाथ में काम होना चाहिए।  

वक्त आ गया अब नए भारत का निर्माण करना होगा , 
हर भारतवासी को देश के लिए पहले सोचना होगा।  

अपने पुरखो की सींची धरा पर कर्म बीज बोना होगा , 
आने वाली पीढ़ी के लिए " स्वच्छ और निर्मल" भारत देना होगा।  

जात-पात , धर्म - अधर्म , ऊँच -नीच से ऊपर उठना होगा , 
हरेक नागरिक को अब " भारतीयता " को समझना होगा।  

हिमालय से कन्याकुमारी , कच्छ से अरुणाचल तक अब बिगुल फूँकना होगा , 
"विश्व गुरु " का गौरव फिर से वापस पाना होगा।  

सिंहनाद कर दे सवा अरब भारतवासी जिस दिन , 
दुनिया का कोना कोना थर्रा जायेगा। 

शर्त सिर्फ पहले यह हैं की , 
हमें अपने को अंदर से जगाना  होगा।  

अपनी ऊर्जा , सामर्थ्य और विवेक को , 
देश हित में लगाना होगा।  

हर हाल में अब देश जगना चाहिए , 
"विश्व विजय " की रणभेरी लेकर हर भारतवासी चलना चाहिए।  

Monday, January 2, 2017

खुद की , खुद से ........( 2017 की पहली कविता )

 



क्या हैं ? हम में वो जुनून और वो जज्बा की
हम खुद से मुकाबला करे
रोज़ अपने लिए कुछ पैमाने तय करे औरऔर उन पर खरा  उतरे
अपने लिए खुद नियम बनाये और उन पर अमल करे
क्यूंकि हमें दुसरो की नक़ल नहीं करनी
हमारा तो खुद से मुकाबला हैं
अपने को बेहतर से और बेहतर करने की जंग
हमारे ही भीतर तो हैं। 

हमें हमारी सोच बदलनी होगी
अपने पंखो को परवाज देनी होगी
खुला आसमान हैं ये जहाँ
क्षितिज की तलाश हमें खुद करनी होगी ,
  रुकना होगा , झुकना होगा 
अपने लक्ष्यों तक अपने जूनून से पहुचना होगा ,
 लगेगी थोडा देर भले ही ,
हार ने मानने का जज्बा रखना होगा
हिम्मत  रखनी पड़ेगी दुनिया बदलने की
हर हालात में मुस्कराये ये कलेजा रखना होगा। 

दुनिया हमें पागल कहे तो भी अपना रास्ता खुद चुनना होगा
सफलता और असफलता को बिना ध्यान में रखे
हमें  अविरल बहना होगा,  
भेडचाल में चल के बहुत देख लिया अब
अपने लिए खुद का  मुकम्मल जहाँ बनाना होगा ,
 अपने ज़िन्दगी कारवां को हमें
और बेहतर बनाना होगा। 


Sunday, December 25, 2016

2016 को अलविदा और 2017 का स्वागत

चलो  की आगे बढ़ते हैं , 
2016 को अलविदा  और  2017 का स्वागत करते हैं।  

खट्टी - मिट्ठी यादो का पिटारा दे गया 2016 , 
2017 में और अच्छे की उम्मीद करते हैं !! 

ये समय चक्र हैं , 
अनवरत चलता रहेगा।  

बीता साल इतिहास का पन्ना , 
और आने वाला साल उम्मीदें गढ़ेगा !!

बस इतना याद रखियेगा , 
हर बीता पल  आपके जीवन खाते से ही कटता हैं।  

कुछ लोग हर पल को जी जाते हैं , 
और कुछ लोगो का बस गुजर जाता हैं !!

चलो की सब गिले-शिकवे , दुःख दर्द भूलते हैं , 
नए साल में फिर से नयी शुरुवात करते हैं।  

ज़िन्दगी एक नियामत हैं उस ईश्वर की , 
आओ की एक नयी परिभाषा गढ़ते हैं !! 

Thursday, December 22, 2016

कवि और कविता

जो देखता हूँ , वो लिखता हूँ !
शब्दो को आड़े तिरछे - आगे पीछे पिरोता हूँ !!

जो महसूस होता हैं !
शब्दो के जरिये बयां करता हूँ !!

अपने को कवि नहीं कहता  !
फिर भी कविताये लिखने का प्रयास करता हूँ !!

खालिस कवि तो विरला होता हैं !
वो शब्दो को मोती बना कविता को पिरोता हैं !!

कल्पना को अपनी शब्दो में जीवंत करता हैं !
एक  एक शब्द से पूरा सार गढ़ता हैं !! 

कभी भावनाओ के अतिरेक में बह कर विद्रोही सा लगता हैं !
कभी किसी विषय पर आँखों के कोरे गीली कर देता हैं !!

कवियों का संसार भी अजब हैं !
हर कोई दिल से यायावर और मस्तमौला हैं !!

हर चीज में उन्हें कविता सूझ जाती हैं !
ज़िन्दगी की  इस आपाधापी में भी  कलम बेबाक चलती हैं !!

Saturday, November 19, 2016

बदलाव की बयार ( नोटबंदी )

एक कोशिश हुई कुछ बदलने की , 
जो हम दिल से चाहते हैं !
किसी ने तो पहल की वो दुनिया बनाने की , 
जिसमे हम रहना चाहते हैं !! 

बदलाव की बयार बह रही हैं , 
हमें भी कुछ बदलना होगा !
अपने " आने वाले कल" के लिए,
 " आज " संघर्ष करना होगा !! 

देश आज दोराहे पर खड़ा हैं , 
कोई रास्ता तो चुनना होगा !
या तो ऐसे ही चलते रहो , 
या फिर परिवर्तन का हिस्सा बनना होगा !! 

बेशक अभी परेशानी बहुत हैं , 
हर तरफ हाहाकार हैं !
लोगो के सब्र का ये कड़ा इम्तेहान हैं , 
" देश " के लिए आज यही तो बलिदान हैं !! 

Monday, November 14, 2016

नोटबंदी के साइड इफेक्ट्स

पूरा विपक्ष एकजुट हो गया , भूल गया अपने उसूल !
कालेधन पर हथौड़ा मारा हैं , उनसे पूछे बिना मोदी जी ने शायद कर दी भूल !!

कुछ समय तो देते मोदी जी उनको , ठिकाना लगाना था काला धन !
वर्षो की मेहनत पर उनके , उड़ेल दी सारी धूल !!

"ऐसा भी कोई करता हैं" - एक झटके में ऐसे फैसला लेता हैं !
खिसयानी बिल्ली खम्बा नोचे , सारे देश को कोई क्या  लाइन में लगाता हैं ? !!

 सारा देश लाइन पर लग गया , छोड़ के सारे काज !
क्या ऐसे कोई करता हैं "काले धन " का पर्दाफाश ? !!

 आतंकवादी - आतंक भूल गए , उनके आकाओ को गया पसीना !
दुश्मन भी चित हुआ - बिना वार किये दिखा दिया छप्पन इंची सीना !!

गरीब आज खुश हुआ , मिला उसे बराबरी का ताज !
बड़े बड़े धन्ना सेठो कोचिंतित देखा आज !!

 ऐसा अवसर इतिहास में यदा -कदा ही आता हैं !
जब छोटा नोट , बड़े नोट को उसकी औकात  दिखाता हैं !!

खुल गए खजाने सब , टूट गयी तिजोरियाँ !

बनने चल दिया मेरा 'भारत ' फिर से 'सोने की चिड़िया ' !!

Wednesday, November 9, 2016

ऐ ! सैलरी , जरा धीरे धीरे गुजर। ( सभी वेतनभोगी कर्मचारियों को समर्पित)


तेरे इन्तजार में न दिन देखा-न रात ,
अब आयी हैं तो जरा ठहर !

मुझे तेरे होने का एहसास तो होने दे ,
कुछ वक्त तो मेरे साथ गुजार ले !

तेरे आने की आहट से ही दिल सुकून से भर जाता हैं ,
तेरे जाने पर दिल मेरा जार जार रोता हैं !

जब तक तू मेरे साथ रहती हैं ,
मेरा हर दिन होली , रात दिवाली होती हैं !

तेरे चले जाने के बाद ,
हर दिन बेरंग और रात अमावस होती हैं !

तू तो इतरा कर चली जाती हैं ,
तुझे इल्म नहीं हैं शायद , उसके बाद मुझपर क्या बीतती हैं ? !

तेरे फिर से आने के ख्यालो से जी लेता हूँ ,
हर रोज़ जी और मर लेता  हूँ !

अब आना -तो थोड़ी फुरसत लेकर आना,
कुछ दिन और रुककर मुझे ज़िंदा होने का एहसास करा जाना !

तेरी बाट जोहूंगा ,
हो सके तो समय पर आ जाना ! 

काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक

मोदी जी हद कर दी , 
एक झटके में ५०० और १००० के नोटों की गड्डी रद्दी कर दी !

कितने जतनो से कमाई थी , 
नजर न लगे किसी की , सबसे छुपाई थी !

न जाने कहाँ कहाँ लक्ष्मी माता कैद रखी थी , 
तुम्हारे एक एलान से झटके में मुस्कराई थी !

काली तिजोरियो में हड़कंप हैं , 
पहली बार १०० के नोट के आगे ५०० का नोट बेदम हैं !

अब कैसे लड़े जायेंगे चुनाव -कैसे होगा हवाला कारोबार , 
इस सर्जिकल स्ट्राइक में वाकई दम हैं !

हर बार कुछ गजब कर जाते हो , 
इतना बड़ा जिगर कहाँ से लाते हो ? !

लगता हैं कुछ कर जाओगे , 
इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरो में लिख जाओगे।  

Tuesday, November 8, 2016

पलायन का दर्द




छोड़ कर अपना घोंसला एक दिन , 
उड़ पड़ा  पंछी नया आसमां ढूंढने , 

नए पंखो की उड़ान लंबी थी , 
सब कुछ नाप जाने की ललक भी थी , 

नई उम्मीदे , नए हौंसले 
नव किरण की आस लिए 

माँ ने समझाया - बाप ने बुझाया ,बहनो ने रिझाया - भाइयो ने हड़काया। 
सबकी अनसुनी कर , उड़ चला वो मस्तमौला अपनी दुनिया से अनजानी दुनिया में रम गया।।

वो नयी दुनिया पाकर मस्त हो गया , घोंसला उसका बिखर गया ।  
उसको नया आसमां रास आ गया , पीछे उसका सब कुछ छूट गया।।  

बहुत कुछ मिल गया उसे ,  पा लिया सबकुछ  जिसकी उसको चाह थी।  
मगर बैचैनी थी  कुछ उसे , शायद उस मिटटी में कुछ अलग बात थी।। 

चकाचौंध की अपनी नयी दुनिया में, अब उसे सुकून की तलाश थी।  
रौंदा था जिस मिटटी को बचपन में , शायद उसको उसकी खुशबूं अब भी याद थी।।

स्वंछंद और बेफिक्रे घूमने की शायद  उस पर पाबन्दी थी।  
डरा डरा रहने की शायद , नए आकाश में  मजबूरी थी।।  

Sunday, November 6, 2016

फिजायें कुछ बदली सी हैं .... ( देश की राजधानी और उसके आसपास के वातावरण पर समर्पित कविता )

आबो हवा कुछ बदली सी हैं , कोहरे की चादर ओढे सुबह रो रही  हैं !
सूरज अपनी किरणे भेजता तो हैं , ये अजीब सी धुंध अपने अंदर सोख रही हैं !!

फक्र होता था जिन हवाओ पर कभी , आज वही जहरीली सी क्यों हैं ? !
लगता हैं कही कुछ साजिश हैं , हवाओ को कैद करने की मंशा तो नहीं हैं ? !!

आँखे लहूलुहान , फेफड़ो का दम घुट रहा हैं !
कही इसके लिए हम सब तो जिम्मेदार नहीं हैं ? !!

प्रक्रति तो अपने तय नियमानुसार ही चलती हैं !
जैसे करोगे वैसा भरोगो - बार बार कहती हैं !!

हवाओ ने भी अब सीधा सबक सिखाने की ठान ली हैं !
दंभ और आडंबर ओढ़े हम इंसानो को अपनी करनी याद दिला दी हैं !! 

Friday, October 21, 2016

हिटो ददा भूली , हिटो भे -बेणियओ ( कुमाउँनी कविता )




हिटो ददा भूली , हिटो भे -बेणियओ- पहाड़ बुलौनी !
नौव ठण्ड पाणी , बांज बूझाणी - सब धात लगौनी !!

पौरो  की बखई, धार मी कौ घाम - सब तरसनि !
गद्दुआ का झाल , उ भट्टाक डुबुक - तुमर राह देखणी !!

आलूक गुटुक - काकड़ फूलुन - तुमकू बुलौनी !
का छा रे नान्तिनो - गोल्ज्यू और गंगनाथ ज्यूँ बुलौनी !!

आमेक बुबु फसक - गुड़ कटक चाह -धरिये रौनी !
आपण नान्तिनो लीजि पहाड़ आंस बहूनि !!

Friday, October 7, 2016

बहरूपिये


इधर उधर - यहाँ वहाँ बहरूपिये घूम रहे हैं !
अंदर से कुछ और , बाहर से कुछ और - अपने मौके ढूंढ रहे हैं !!

शेर की खाल का लबादा ओढे बहुत सियार  घूम रहे हैं !
बचा के रखो खुद को , दोस्त बनकर कुछ दुश्मन खंजर लिए घूम रहे हैं !! 

रिश्ते नाते , सच्चाई को ताक पर रख रहे है !
कुछ लोग भरे बाजार चंद रुपयो में ईमान बेच रहे हैं !!

दौर गजब का चल रहा हैं !
नालायकी शबाब पर और लायक बड़ी मुश्किल से गुजर बसर कर रहे हैं !!

सही रास्ते पर चलने की सीख देने वाला दकियानूसी हैं !
बरगलाने वाले  - शुभचिंतक बन रहे हैं !! 

सच्चे और ईमानदार अभी भी चुपचाप  नेक काम कर रहे हैं !
बहरूपिये ताल ठोककर अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं !!