Amazon-Buy the products

Friday, June 22, 2018

परवाज

पंखो को परवाज दिए जमाने हो गए , 
जमाने के आगे बेबस से हो गए , 
क्यों नादानियाँ करने से घबराता है अब दिल , 
क्या अब हम बहुत " सयाने " हो गए।  

दर्द अब भी उठता है सीने में , 
आँसू बहाये जमाने हो गए , 
जबरदस्ती की मुस्कराहट को ख़ुशी मत समझ , 
बेबाक हँसी को होंठ तरस गए ।  

खुद को इतना रमा दिया जगत में , 
अपना वजूद भूल गए , 
ताकते रहते है अब दुसरो का मुँह अब , 
उनके हिसाब से मनोदशा तय होने लगे।  

तेरे जीवन का संघर्ष , 
कौन तुझसे बेहतर जानता है यहाँ , 
अपने दिल से पूछ , 
यहाँ तक पहुँचने में लोगो को जमाने लग गए।

तेरे सपने तेरे अपने है , 
तेरे जूनून को दुनिया क्यों समझे ,
कदम बढ़ाने ही होंगे , 
बिना मेहनत के कहाँ , किसके सपने सच हुए।  

Friday, June 15, 2018

फलसफा

बेमतलब ज़िंदगी को कोसते रहे ,
कभी वक्त की मार या किस्मत का रोना रोते रहे ,
थी अपनी गलतियाँ ,
ज़िन्दगी को बदनाम करते रहे।

कितनी उपजाऊ थी वो जमीन,
जिसके  ऊपर थोड़ा कंकड़ -पत्थर बिखरे थे ,
वो पड़े थे ताकि मिट्टी न उड़े ,
हम उसे बंजर कहते रहे।

हर कदम पर मौके देती रही ज़िन्दगी ,
हम अपने गुरुर में जीते रहे ,
जब तक समझ आया फलसफा ,
हम बहुत दूर निकल गए।

ढूंढते रहे ज़िन्दगी में ख़ुशी ,
मिली भी खुशियाँ अनेको ,
बिना जिये उनको , और ख़ुशी की चाहत में
भटकते रह गए।

ज़िन्दगी तो चाहती थी ,
हमारे हर पल में शरीक होना ,
हमें गुरुर था अपने "मैं" होने का ,
उसको "बेवफा " का तमगा लगाते रहे।  

Thursday, June 14, 2018

ज़िन्दगी क्या है ?


ज़िन्दगी क्या है ?
हसरतो के समंदर में , 
उम्मीदों के गोते है , 
कभी हाथो में मोती , 
कभी खाली हाथ भी लौटे है।  

ज़िन्दगी क्या है ?
सपनो के आसमान में , 
हौंसलो के पंख है , 
कभी क्षितिज के उस पार तक जाने की ललक , 
कभी थोड़ा पँख फड़फड़ाने से थकान है।  

ज़िन्दगी क्या है ? 
अपेक्षाओं के धरातल  में , 
रिश्तो का जाल है , 
कभी खरे उतरते , 
कभी दुःख का जंजाल है।  

ज़िन्दगी क्या है ?
भावनाओ के पहाड़ में , 
आत्मबल का साथ है,
कभी गिरे , कभी चढ़े 
चलते रहने का नाम है।  

ज़िन्दगी क्या है ?
ईश्वर की रहमतो में , 
एक नायाब वरदान है ,
कभी बोझ , कभी फूलो सी सेज ,
सबकी अपनी अपनी पहचान है।  

Saturday, June 9, 2018

कशमकश

माथे पर चिंताओं की लकीरें  क्यों है ?
चेहरे पर ये मायूसी सी क्यों है ?
खोया खोया सा हर शख्स यहाँ , 
बेचैनी का तूफ़ान लिए क्यों है?  

आज़ादी की तमन्ना लिए दिल में , 
हर सांस में घुटन में क्यों है ?
खुद अपनी राह बनाने निकला , 
भीड़ में  शामिल क्यों है ?

सीने में तूफानों से जज्बात , 
सहमा सहमा सा क्यों है ?
रिश्तो में पला बढ़ा , 
रिश्तो से अब चिढ़ क्यों है ?

उसूलो की ताकत , 
हकीकत के धरातल पर तड़पती क्यों है ?
घिरा हुआ है भीड़ से , 
फिर भी अकेला क्यों है ?

कुछ पाने की ख़ुशी नहीं , 
सब कुछ पा लेने की ज़िद्द क्यों है ?
अपनी पहचान बनाने चला था , 
दुसरो के अक्स में अपने को तलाशता क्यों है ?

मेहनत ही सफलता की कुंजी , 
परिश्रम से घबराता क्यों है ?
धैर्य और संयम का पाठ , 
हर मोड़ पर भूलता क्यों है ? 

कशमकश ये कैसी , 
रातो की नींद गायब क्यों है ?
खिलखिलाता चेहरा जिसकी पहचान , 
हर हँसी में दर्द  छलकता क्यों है ? 

कुछ तो बदली है आबो हवा , 
कुछ पानी में जहर है , 
घुट घुट कर सिसक रही ज़िन्दगी , 
ज़िन्दगी को शायद कुछ सुकून की जरुरत है।  

Monday, May 21, 2018

चिर विश्राम

बहुत दूर तक जाना चाहता हूँ ,
जब तक थक कर चूर न होऊं ,
तब तक चलना चाहता हूँ ,
तुझमे मिलने से पहले ,
मैं जीना चाहता हूँ। 

जीवन रस से भरा हुआ है ,
हर रस का स्वाद चखना चाहता हूँ ,
जीत -मिले या हार ,
हर अनुभव लेना चाहता हूँ। 

कितने रंग बिखरे पड़े है ,
हर रंग का मतलब अलग अलग,
मैं उन रंगो से ,
अपना एक इंद्रधनुष बनाना चाहता हूँ। 

अनंत आकाश , धरती विशाल
जानता हूँ पग  छोटे मेरे  ,
फिर भी जिद्द है मेरी ,
अपना एक संसार बनाना चाहता हूँ। 

सुख - दुःख आएंगे कितने ही ,
उनको हँस कर पार करूँगा  ,
चिर निद्रा में जाने से पहले ,
जीवन को एक नया अर्थ देना चाहता हूँ। 

मेरा प्रारब्ध तेरे हाथो में ,
हर जगह साये की तरह मेरे साथ तू ,
ये जीवन तेरी थाती है ,
तुझमे मिलने से पहले -अपने पदचिन्ह उकेरना चाहता हूँ। 

जानता हूँ किराये का ये जहाँ ,
मेहमान बनकर आया हूँ ,
क्या लाया -क्या पाया के दलदल से उभरने से पहले ,
जीवन के हर क्षण को जीना चाहता हूँ। 

कमियाँ बहुत है मुझमे ,
हर पल सीख है जीवन में ,
अपनी जय -पराजय का मैं खुद ,
साक्षी बनना चाहता हूँ। 

चिर -विश्राम से पहले ,
खुद को जीवन समर में ,
तन -मन और कर्म से ,
पूर्णत :झोंकना चाहता हूँ। 

तेरी कृति हूँ मैं ,
तुझमे ही समाना है ,
जीवन सत्य अटल , अडिग है ,
कुछ उपमान मैं  भी गढ़ना चाहता हूँ। 

इतना ज्ञान बिखरा पड़ा है ,
एक जीवन में समेट पाऊँ ,
संभव नहीं है ,
बस किसी किताब का एक पन्ना बनना चाहता हूँ। 

राग , द्वेष , क्रोध , मद, लालच , घमंड 
फैला रहा है अपनी जड़े
इन सबसे विरक्ति का ,
कोई मार्ग खोजना चाहता हूँ। 

रिश्ते - नाते मतलब खो रहे ,
स्वार्थ के पनपते बीजो के बीच,
किसी असहाय और निर्बल की ,
एक आस की किरण बनना चाहता हूँ। 

मानवता का  नित रोज़ पतन ,
उसूलो का बलिदान ,
मूल्यों की रक्षा के खातिर ,
शंखनाद करना चाहता हूँ। 

जानता हूँ मिटटी से बना मैं ,
मिट्टी में ही मिल जाऊँगा ,
किस बात का घमंड करूँ ,
कोई फूल उग सके, वो मिट्टी बनना चाहता हूँ। 

चिर विश्राम में जाने से पहले ,
धरती में आने के,
अपने प्रयोजन को ,
इति -सिद्धम करना चाहता हूँ।  

Friday, May 18, 2018

कारवाँ जारी है



जीवन अपनी गति से बढ़ रहा , 
कोई आगे - कोई पीछे चल  रहा ,
किसी के माथे पर थकन की शिकन , 
कोई मदमस्त गीत गुनगुना रहा , 
देखो !जीवन कारवाँ गुजर रहा।  

किसी को क्षितिज के उस पार की चिंता , 
कोई गुबार में उलझ रहा , 
किसी को सहारे की जरुरत , 
कोई अकेला ही चल रहा ,
देखो ! जीवन कारवाँ गुजर रहा।  

कही जेठ की धूप झुलसा रही , 
कहीं चाँद अपना अमृत बरसा रहा , 
बनते - बिगड़ते रिश्तो के बीच , 
प्रेम अपनी राह खुद बना रहा , 
देखो ! जीवन कारवाँ चल रहा।  

सब उम्मीदों को सहारा बनाकर , 
यादों की गठरी उठाकर , 
अपने सफर को यादगार बनाने की कशमकश में ,
चला जा रहा,
देखो ! जीवन कारवाँ चल रहा।  

किसी की ख्वाहिशें पनप रही , 
किसी को सफर लम्बा लग रहा , 
जो अँधेरे में भी साहस न छोड़े , 
उसका सफर आरामदायक कट रहा ,
देखो ! जीवन कारवाँ चल रहा।  

राहों में कही फूल बिखरे पड़े , 
कही काटों से भी पाला पड़ रहा , 
संतुलित होकर जो चल रहा , 
इस कारवाँ का आनंद वही ले रहा , 
देखो ! जीवन कारवाँ चल रहा।  

चलना अकेले ही है , कुछ साथ आ गए तो अच्छा है , 
कहकहे लगाते आगे बढ़ते रहिये ,
सुख -दुःख बाँटते हुए चलते रहिये, 
आपके पदचिन्हो पर वो देखो, 
कोई चल कर अब आगे बढ़ रहा , 
देखो ! जीवन कारवाँ चल रहा।  

Monday, April 23, 2018

हर सुबह - नई रोशनी




कुछ उम्मीदें , कुछ आशाएँ
कुछ विश्वास लेकर रोज़ उठता हूँ ,
कल से बेहतर आज को बनाऊँगा ,
नयी सुबह का आगाज करता हूँ। 

दफ़न कर देता हूँ कड़वी यादों को बुरा सपना समझकर ,
अच्छी यादो को संजो लेता हूँ ,
निकल पड़ता हूँ हर रोज़ एक नए सफर में जैसे ,
इस तरह से मैं रोज़ अपना " कारवाँ जारी " रखता हूँ। 

मिलते है कई लोग मुझे ,
रोज़ कुछ न कुछ सीख लेता हूँ ,
मेरी ख़ुशमिज़ाजी का राज बस इतना सा हैं ,
दुसरो से ज्यादा अपेक्षा नहीं , खुद पर भरोसा रखता हूँ। 

जहाँ से सीख मिले , उसे भी अपनाता हूँ
पत्थर से टकरा जाऊं , तो फिर संभल कर चलता हूँ ,
जीवन उस खुदा का दिया अनमोल तोहफा है ,
"व्यर्थ" न चला जाये , हर मुमकिन कोशिश करता हूँ। 

Wednesday, April 18, 2018

तितलियाँ

ये रंग बिरंगी तितलियाँ मुझे बहुत भाती है , 
फुर्र से उड़ जाती है , 
कभी इस जगह , कभी उस जगह 
अपने पंख फड़फड़ाती है।  

रंगीनियत सी भरती ये , 
कितनी प्यारी लगती है ,
एक फूल से दूसरे फूल , 
इतराती -इठलाती है।  

छोटे से जीवन में , 
कितना जीवन जी जाती हो  , 
सुनने में असमर्थ तुम  , 
स्वाद का पता पैरो से लगाती हो।    

तितली - ओ तितली , 
तुम कितना कुछ सिखा जाती हो , 
स्वछंद होकर अपनी मस्ती में , 
जीवन को एक नया अर्थ दे जाती हो।  

काश तुम्हारे जैसा जीवन , 
इंसानो की बस्ती में भी होता , 
छोटी छोटी तितलियाँ भी यु ही इठलाती फिरती , 
कुटिल नजरो से काश वह बच पाती।  

बंदखानो दरवाजे के पीछे , 
सिसकियाँ यूँ न गूँजती , 
लेकर अपना जन्म वो , 
तुम जैसा  तितली जीवन जी पाती।  

Friday, April 6, 2018

सीख


सुलझाते रहो रिश्तो के धागे ,
बहुत महीन और नाजुक होते है ,
देर गर हो गयी तो ,
गाँठ बन जाते है।

बस चार दिन का बसेरा है ये जहाँ ,
किराये का घर है ,
अपना कुछ नहीं यहाँ ,
फिर कुछ खोने से क्या डर है?

कुछ भी स्थायी नहीं जगत में ,
वक्त जो आपके हाथ में है ,
उससे बढ़कर और कुछ भी नहीं  ,
जी लो बस " आज " को , क्यूंकि "कल" कभी आता नहीं। 

बेशक योजना बनाओ कल की ,
मगर उसके चक्कर में आज गँवाओ नहीं ,
ये वक्त है ,
एक बार हाथ से फिसला ,फिर लौटता नहीं। 

Wednesday, March 7, 2018

प्रार्थना



हे ! रचनाकार जगत के ,
नमन और अभिनन्दन , 
चराचर जगत के स्वामी , 
हाथ जोड़कर सादर वंदन।  

लोभ , माया , क्रोध , अहंकार से ,
चहुओर हो रहा क्रंदन ,
करने कब आओगे इसका हरण , 
कैसे मौन हो ? हे ! रघुनन्दन।  

ज्ञान पर अज्ञान भारी , 
शुभ नहीं है ये लक्षण , 
सिसक रही है जगत जननी , 
हो रहा रोज चीरहरण।  

सेवक भक्षक बन गए , 
भूल गए सब ईमान धर्म ,
झूठ की जय जयकार हो रही , 
सत्य तोड़ रहा है दम।  

तन्द्रा तोड़ो , सेज छोड़ो 
अवतरित हो अब भगवन ,
मूल्यों की स्थापना के लिए , 
छेडो फिर एक " महाभारत " का रण।  

Sunday, February 25, 2018

फाग के रंग - होली के संग ( होली हुल्लड़ )




गजब तमाशा हो रहा है , 
देश को मेरे ये क्या हो रहा है।  

बैंको से धन कोई उड़ा रहा है , 
उसकी भरपाई में जनता पर नया टैक्स लग रहा है।  

गरीब मरे भूख से , उसकी चिंता कोई नहीं कर रहा है , 
तैमूर को तीन दिन से पॉटी नहीं हुई , चिंता सारी देश कर रहा है।  

नेट पैक दिन पर दिन सस्ता हो रहा है ,
जरुरी चीजों का दाम रोज़ चढ़ रहा है।  

एक लड़की ने आँख मटकायी , उसको वीडियो वायरल हो रहा है 
फौजी की शहीदी की खबर , अखबार के किसी कोने पर दम तोड़ रहा है।  

राजनीति  का स्तर रोज़ नीचे गिर रहा है , 
कोई किसी को "पप्पू " , कोई किसी को "फेंकू " कह रहा है ,
देखकर आजकल देश के हालात , 
सच में मेरे देश में " फॉग " चल रहा है।  

Wednesday, February 14, 2018

राधा कृष्ण



कुछ तो बोल राधा  ,
श्याम तेरा क्यों न हुआ ,
तू उसके प्रेम में पगली बनी ,
श्याम किसी और का क्यों हुआ।

सुन सखी , प्रेम तो त्याग है
ये देह का नहीं , दिलो का राग है ,
मिल जाते कान्हा मुझे तो ,
फिर हमारा प्रेम कैसे अमर होता।

राधा कृष्ण तो एक है ,
और सदा एक ही रहेंगे ,
एक दूजे के बिना वो अधूरे है , 
एहसास है प्रेम , 
जो शब्दों से बयां मुश्किल से होता है , 
रूह से जुड़े होने का जज्बात है ये , 
बस दिल ही दिल बयां होता है।  

प्रेम की पराकाष्ठा ये है सखी , 
उसकी हर सांस में प्रेमी का , 
स्वर होता है , 
दैविक है प्यार तो , 
ये शारीरिक सीमाओं में नहीं बंधा होता है।  

Tuesday, February 6, 2018

संघर्ष



जिद्द है तो जूनून भी चाहिए
मंजिले यूँ ही हासिल नहीं होती ,
दाँव पर लगाना पड़ता है सब कुछ ,
कामयाबी यूँ ही खैरात में नहीं मिलती। 

पूछो जरा हीरे से ,
उसकी कीमत यूँ ही ज्यादा नहीं होती ,
जलकर , तपकर और भार सहकर ,
कालिख कोयले की उसे हटानी पड़ी। 

यूँ ही एवरेस्ट ने उच्चाई हासिल नहीं की ,
झेला उसने लाखो वर्षो का घर्षण ,
सिसक सिसक कर एक इंच बढ़ा ,
रातो रात उसकी तस्वीर नहीं बदली। 

उठो , गिरो , सम्भलो
फिर पुनः प्रयास करो
तोड़ेगी , मरोड़गी -ज़िन्दगी
कदम कदम पर इम्तेहान लेगी। 

हौंसलो में जिसके दम होगा ,
उसके माथे पर ही विजय तिलक होगा ,
ज़िन्दगी की संघर्ष गाथा का ,
वो नया नायक होगा।  

Friday, January 19, 2018

लहर ( व्यंग्य )

बड़ी लहर है , 
कौन, किससे यहाँ कमतर है ,
मौके की तलाश में सब , 
न जाने कौन , कब सिकंदर है।  

बड़ी लहर है , 
सबके एक कीड़ा अंदर है , 
बिना हाथ पैर चलाये , 
काम हो जाये तो बेहतर है।  

बड़ी लहर है , 
सब नेता बनने पर तुले है , 
कोई आगे बढ़ जाये गर , 
उसकी टाँग खींचने में सब अड़े है।  

बड़ी लहर है , 
रोज़ नए नए मुद्दे उछलते है , 
बिना एक भी सुलझायें , 
सत्ता सत्ता खेल रहे है।  

बड़ी लहर है , 
महिलाएं सुरक्षित नहीं है , 
बच्चो का भविष्य खतरे में , 
उन्नति के आँकड़े रोज़ पेश हो रहे है।  

बड़ी लहर है , 
प्रदूषण की हर तरफ मार है , 
खुद की रक्षा के लिए , 
खुदा की सर्वश्रेष्ठ रचना एटम बम लिए तैयार है।  

Sunday, January 14, 2018

पुरानी डायरी

कुछ ढूंढते ढूंढते , 
मिली मुझे मेरी वह पुरानी डायरी , 
जिसे मैं शायद कब का भूल गया था , 
उसका कवर भी अब जैसे दम तोड गया था , 

हाथो से उस पर लगी धूल  झाड़ी , 
पहले पन्ना खोला , 
तो जैसे मुस्करा रहा था , 
कितने सालो के बाद साक्षात्कार , 
हो रहा था ,
पूछ रही थी शायद , 
कहाँ  थे " इतने साल " ? 

उस डायरी का मेरी ज़िन्दगी से बड़ा लगाव था , 
उसके हर पन्ने पर मेरा एक ख्वाब था , 
मेरी अल्हड़पन की ख्वाईशो का , 
वो पुलिंदा था , 
मेरी हसरतो का जैसे वो , 
पूरा चिटठा था।  

मेरी दोस्तों के हस्ताक्षरो से , 
किसी पन्ने पर वो डायरी सजी थी , 
मेरी अधपकी कविताओं के  , 
बोझ से वह मर रही थी।  

कुछ लैंडलाइन नंबर अब भी , 
उसमे चमक रहे थे , 
कुछ लोगो के पते , 
अब भी उसमे लिखे थे।  

कुछ पन्नो पर " गणित के सूत्र " ,
अब भी लिखे थे , 
कई पन्ने " हिंदी गानो " से , 
भरे थे।  

कुछ चिट्ठिया 'अन्तर्देशी पत्र ' की शक्ल में , 
पन्नो के बीच में दबी पड़ी थी , 
अंतिम पन्ने -मेरी पेंसिल से , 
बने चित्रों से अटे पड़े थे।  

किसी पन्ने में ख़ुशी के पल थे , 
किसी पन्ने में स्याह रंग थे , 
कोई पन्ना तो अब भी कोरा था , 
किसी पन्ने पर महान " प्रेरणादायी" विचार चमक रहे थे।    

एक पल जैसे सारा बीता बचपन जी गया , 
उन सुनहरी यादो में खो गया , 
जहाँ से चलकर अब मैं खड़ा था , 
उस डायरी के एक एक पन्ने पर अद्धभुत जीवन था।