शब्दों में "शोर " हो चला हूँ ,
शहरों
में "दिल्ली " हो चला हूँ ,
माँग
रही है हिसाब किताब ज़िन्दगी ,
"उम्मीद"
का लॉलीपॉप थमा रहा हूँ।
देहरी
छोड़ी, घर छोड़ा, गाँव छोड़ा,
दोस्त
छोड़े , परिवार छोड़ा ,
कुछ
बड़ा करने के चक्कर में ,
"शहरों
" में धक्के खा रहा हूँ।
जीविका
के लिये " नौकरी " में हूँ ,
जी
-हुजूरी से उकता गया हूँ ,
ज़िन्दगी
कट रही है नौ से छः के फेर में ,
रविवार
को ही जैसे हफ्ता जी रहा हूँ।
"धोखे
" की इक ज़िन्दगी गुजर रही है ,
सुलझने
की बजाय और उलझ रही है ,
भ्रम
है फुर्सत मिलेगी आगे चलकर,
उम्र
धीरे धीरे उम्रदराज हो रही है।
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