उस दिन जिस दिन हिसाब होगा।
दोषियों में हमें भी गिना जायेगा,
क्यूँकि हमने सब देखते हुए आँखें बंद की थीं,
सब कुछ सुनते हुए भी चुप्पी साधी थी।
हम जानते हुए भी अनजान रहे,
सच सामने था,
फिर भी उससे नज़रें चुराते रहे।
अन्याय हमारे सामने होता रहा,
हम देखते रहे,
सुनते रहे,
और भागीदार बने रहे।
तो फिर
दोषी ठहराने का उनका हक़
हम कैसे छीन सकते हैं?
उस दिन शायद
हमारे पास कहने को बहुत कुछ होगा
डर था,
मजबूरी थी,
हालात ठीक नहीं थे,
हम अकेले क्या कर लेते...
लेकिन क्या सचमुच
हम इतने मजबूर थे?
या फिर
हमने अपनी सुविधा को
सच से बड़ा मान लिया था?
हमने सोचा
आवाज़ उठायेंगे तो
मुसीबत हमारे दरवाज़े तक आयेगी,
इसलिए चुप रहे।
हमने सोचा
कोई और बोलेगा,
इसलिए चुप रहे।
हमने सोचा
हमारा क्या लेना-देना?
और इसी सोच में
किसी और का सब कुछ लुटता रहा।
हम भूल गये थे
अन्याय सिर्फ़ करने वाला नहीं करता,
कभी-कभी
देखने वाला भी उसका हिस्सा बन जाता है।
क्योंकि अपराध करने के लिए
हाथ उठाना ही ज़रूरी नहीं,
कभी-कभी
सही समय पर हाथ न उठाना भी
एक अपराध होता है।
और मौन,
जिसे हम अपनी सुरक्षा समझ रहे थे,
वही एक दिन
हमारे खिलाफ़ सबसे बड़ा सबूत बनेगा।
उस दिन
कोई अदालत नहीं होगी,
कोई गवाह नहीं होगा,
कोई वकील नहीं होगा।
सिर्फ़ हमारा अंतर्मन होगा
और उसके सामने
हम स्वयं खड़े होंगे।
वह पूछेगा
तुम चुप क्यों रहे?
तुमने अपनी आवाज़ क्यों बचा ली?
जब किसी के साथ अन्याय हो रहा था,
तुमने यह क्यों सोचा
कि यह तुम्हारा मामला नहीं है?
कोई उत्तर नहीं होगा।
आँखें नीची होंगी,
चेहरा झुका होगा,
शब्द गले में अटक जायेंगे,
और हम
फिर से मौन हो जायेंगे।
लेकिन इस बार
हमारा मौन
किसी डर की वजह से नहीं होगा।
इस बार
हमारे पास
शर्म के अलावा
कुछ नहीं होगा।
और शायद
उस दिन हमें समझ आयेगा—
दोषी सिर्फ़ वह नहीं
जिसने गलत किया था,
दोषी वह भी है
जिसने गलत होते देखा
और सही के पक्ष में
खड़ा होने से इंकार कर दिया।
क्योंकि इतिहास
सिर्फ़ यह नहीं पूछता
कि अपराध किसने किया था...
इतिहास यह भी पूछता है
तब तुम कहाँ थे?”
और उस दिन
हम चाहकर भी
यह नहीं कह पायेंगे—
“हमें पता नहीं था।”
क्योंकि सच तो यह है—
हमने देखा था।
हमने सुना था।
बस...
हमने बोलना नहीं चुना था।
हमारा सबसे बड़ा दोष
यही था।
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