निकल पड़ा हूँ खुद को ढूँढने,
अंतर्मन को अपने टटोलने,
हर रोज़ पूछता हूँ खुद से सवाल,
आज कितनी की तुने खुद की तलाश,
यु ही तो रचा नहीं होगा खुदा ने मुझे,
सौंपा होगा कुछ न कुछ नेक काम.
बस उसी अंतर्मन की यात्रा को,
शुरू हो गया हैं मेरा अभियान.
न कोई गेरुआ वस्त्र, न कमंडल हाथ में ,
न कोई मंदिर मस्जिद के चक्कर ,
दिल मैं रखकर उस खुदा को,
रोज़ सांसारिक जीवन जी कर,
शुरू कर दी अपनी तलाश.........
हर रोज़ पूछता हूँ खुद से सवाल,
ReplyDeleteआज कितनी की तुने खुद की तलाश, सुंदर अभिव्यक्ति ,शुभकामनायें