Saturday, December 20, 2025

कहो

 


कहो ,

जो दिल में है , कहो,

कोई सुनने वाला न भी हो ,

तब भी कहो ,

अनकही बातें ,

दिल से होते हुए ,

दिमाग में घुस जाती है ,

और कारण बन जाती है ,

अवसादों के ,

और अवसाद में पड़कर ,

धीरे -धीरे शरीर भी ,

कमजोर होने लगता है ,

कहो ,

कोई न मिले ,

तो दीवारों से कहो ,

किसी पहाड़ी में जाकर ,

जोर से कहो ,

कोई नहीं भी सुनेगा तो ,

प्रकृति सुन लेगी ,

और मन , दिमाग , शरीर ,

सब हल्का होकर ,

आराम देगा ,

खाली हुई जगह में ,

नई ऊर्जा और ,

नया सामर्थ्य भरेगा,

मन से ,

दिमाग से ,

गुबार निकाल देने वाले ,

अक्सर ज्यादा जीते है ,

और स्वस्थ रहते है।    

Monday, December 8, 2025

अंतिम मुलाक़ात

 

बहुत कुछ कहना था उस मुलाकात में ,

जिसे हम अंतिम मुलाकात कह रहे थे ,

अगले दिन से हमने अलग -अलग रास्ते चुन लिए थे ,

मर्ज़ी से , उसे कोई शिकायत थी , मुझे कोई गिला ,

हमें पता था यही तक का सफर है हमारा ,

उसे आगे बढ़ जाना था और मेरा सफ़र भी जुदा था ,

दोनों के बीच कोई कड़ुवाहट नहीं थी ,

थे तो वो पुराने बेहतरीन दिन , जो हमने बिताये थे ,

हमारे बीच उस दिन ख़ामोशी ज्यादा थी ,

शायद अल्फाज कम पड़ रहे थे ,

मुस्कराहट के साथ हमने इक दूसरे को अलविदा कहा ,

और अपने -अपने रास्ते चल दिये ,

मुड़ -मुड़कर देखते रहे जब तक ओझल हो गये

एक ख़ालीपन सा जीकर उस रात ,

हमारे रास्ते अलग -अलग हो गये ,

इस आस फिर भी बनी रही ,

वो हमारी "अंतिम मुलाकात " साबित हो।

Thursday, December 4, 2025

दिसंबर

 

सर्द शुरुआत हुई थी ,

सर्द ही अब समाप्त होगा ,

आलम - - दिसंबर ये है ,

जनवरी का लिया हुआ इक ,

अधूरा प्रण बरबस दिल पर ,

नोक की तरह चुभ रहा है। 

 

समझा रहा हूँ बार -बार ,

नये साल पर फिर दोहराऊँगा ,

यह साल तो बीत गया अब ,

कोशिश करूँगा अगले साल ,

प्रण को हरगिज निभाऊँगा ,

दिमाग हँस रहा है , कह रहा ,

मत करना कोई प्रण नये साल।