कुम्ल्हा जाता है शीत में ,
सर्द हवाओं के थपेड़े
झेलता है ,
गिरा देता है पत्तियाँ
सब ,
बसंत की उम्मीद में जी
जाता है।
पहली बसंत की हवा में
,
कपोल फूट पड़ती है ,
ठूँठ सा बना पड़ा था जो
,
पत्तियों से तन ढाँक
लेता है।
फिर खिलने लगते है फूल
,
कलरव होने लगता है ,
झूम -झूम कर बासंती हवा
में ,
सर्द हवाओं का खौफ भूल
जाता हैं।
फिर आता है तपिश का मौसम
,
सूरज आग बरसाता है ,
मुरझा जाती है पत्तियाँ
डाल डाल ,
चौमास के इंतजार में
जी जाता हैं।
पहली फुहार में रोम रोम
,
फिर से जैसे जी उठता
है ,
अठखेलियाँ सा करता बूँदो
संग ,
लहराता सावन के गीत गाता
हैं।
साल दर साल का चक्र यह
,
नये -नये अनुभव कराता
है ,
घबराओ मत -नन्हे पौधों
,
जीवन का पाठ खुद सीख,
बताता हैं।
Nice lines sir
ReplyDeleteवाह आनंद साहब
ReplyDeleteVery nice
ReplyDelete