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Monday, December 14, 2009

पिता ......छाँव हैं बरगद की

छोटा सा था उंगलिया थाम उनके चलना सीखा था,
दुनिया देखी थी उनकी नज़रों से,
सब कुछ कितना ख्वाब सा था,
उनके आगोश में मैं खुद को कितना सुरक्षित पाता था,
वो मेरे बालपन की जिद्द को पूरा करने के लिए,
उनका मम्मी से झगड़ना होता था,
मेरी गलती पर मुझे डांट कर उनका चेहरा उतरता था,
वो मेरे लिए बरगद का पेड़ था,
जिसके नीचे मैं बेख़ौफ़ सोता था.
सच में पिता उस खुदा की नियामत हैं ,
खुद नहीं रह सकता सबके साथ ,
इस लिए पिता को पहले भेजता हैं.
बच्चों को राह दिखाने के लिए,
हर किसी को पिता का साया देता हैं.
लगता था कितने निष्ठुर हैं हमारे पिता,
कलेजे पर पत्थर रख कर देते थे कभी जब सजा,
मन ही मन रोते थे ये हमें भी था पता,
आज जो भी हैं उसका कारण हैं पिता.
नहीं कर सकते हम क़र्ज़ उनका अदा,
बस ! उनको कोई दुःख न दे ,
सबसे बड़ी हमारी यही हैं पूजा.

2 comments:

  1. Great poems dada...really fantastic feeling in ur words...
    Please keep it up.

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  2. wow! maire eye man aansu aagaye is ko pad kar, dad ki yaad aagayi.......

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