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Friday, June 15, 2018

फलसफा

बेमतलब ज़िंदगी को कोसते रहे ,
कभी वक्त की मार या किस्मत का रोना रोते रहे ,
थी अपनी गलतियाँ ,
ज़िन्दगी को बदनाम करते रहे।

कितनी उपजाऊ थी वो जमीन,
जिसके  ऊपर थोड़ा कंकड़ -पत्थर बिखरे थे ,
वो पड़े थे ताकि मिट्टी न उड़े ,
हम उसे बंजर कहते रहे।

हर कदम पर मौके देती रही ज़िन्दगी ,
हम अपने गुरुर में जीते रहे ,
जब तक समझ आया फलसफा ,
हम बहुत दूर निकल गए।

ढूंढते रहे ज़िन्दगी में ख़ुशी ,
मिली भी खुशियाँ अनेको ,
बिना जिये उनको , और ख़ुशी की चाहत में
भटकते रह गए।

ज़िन्दगी तो चाहती थी ,
हमारे हर पल में शरीक होना ,
हमें गुरुर था अपने "मैं" होने का ,
उसको "बेवफा " का तमगा लगाते रहे।  

1 comment:

  1. Really . I shook me by heart showing the madness of people for chasing success while we are already have succeeded only due lack of capability to feel it in the way it should be..... Great thought bhaiya g

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