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Tuesday, December 19, 2017

कैलेंडर बदल रहा है


दीवार पर टंगा २०१७ का कैलेंडर , 
अब फड़फड़ा रहा है।  

जल्दी है उसको जगह खाली करने की , 
नए कलेवर में २०१८ आ रहा है।  

वक्त के आगे वो भी मजबूर है , 
यादो की पोटली बाँधे , अब उतर रहा है।  

उस कील को धन्यवाद कहिये , 
जो संभाले रखी थी इसको , 
अब उसी पर नए साल का , 
ये कैलेंडर चढ़ना है।  

आगे , बढिये - हर रोज़ ये कैलेंडर कहता है , 
खुद से काटकर एक नया दिन हमें देता है , 
यही नियति है शायद , 
वक्त यहाँ सबका बदलता है।  

2 comments:

  1. बहुत खूब दाज्यू

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  2. उस कील को धन्यवाद कहिये ,
    जो संभाले रखी थी इसको ,
    अब उसी पर नए साल का ,
    ये कैलेंडर चढ़ना है।
    इन पंक्तियों का बहुत गूढ़ अर्थ है।

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