Friday, January 16, 2026

ज़िन्दगी का पंचनामा

 

शब्दों में "शोर " हो चला हूँ ,

शहरों में "दिल्ली " हो चला हूँ ,

माँग रही है हिसाब किताब ज़िन्दगी ,

"उम्मीद" का लॉलीपॉप थमा रहा हूँ।

 

देहरी छोड़ी, घर छोड़ा, गाँव छोड़ा,

दोस्त छोड़े , परिवार छोड़ा ,

कुछ बड़ा करने के चक्कर में ,

"शहरों " में धक्के खा रहा हूँ।

 

जीविका के लिये " नौकरी " में हूँ ,

जी -हुजूरी से उकता गया हूँ ,

ज़िन्दगी कट रही है नौ से छः के फेर में ,

रविवार को ही जैसे हफ्ता जी रहा हूँ।

 

"धोखे " की इक ज़िन्दगी गुजर रही है ,

सुलझने की बजाय और उलझ रही है ,

भ्रम है फुर्सत मिलेगी आगे चलकर,

उम्र धीरे धीरे उम्रदराज हो रही है।

Wednesday, January 7, 2026

उसूल

  

दूसरों के लिए होते है उसूल ,

अपने लिये लगते है फ़िजूल ,

दुनिया में सामर्थ्यवान ही सब कुछ है ,

नैतिकता है इनके लिये धूल।

 

कटु सत्य तो ये है ज़माने का ,

पैसे और रुतबे का ही है खेल सारा ,

जपते रहो मानवता का पाठ बराबर ,

वो आयेंगे और बदल देंगे खेल सारा।

 

खेल सारा इस पार और उस पार का है ,

इस पार ज्यादा है , उस पार कम है ,

षड़यंत्र ऐसा , जिसकी कोई थाह नहीं ,

कम वालों का ज्यादा पर नियंत्रण सारा है।

Saturday, December 20, 2025

कहो

 


कहो ,

जो दिल में है , कहो,

कोई सुनने वाला न भी हो ,

तब भी कहो ,

अनकही बातें ,

दिल से होते हुए ,

दिमाग में घुस जाती है ,

और कारण बन जाती है ,

अवसादों के ,

और अवसाद में पड़कर ,

धीरे -धीरे शरीर भी ,

कमजोर होने लगता है ,

कहो ,

कोई न मिले ,

तो दीवारों से कहो ,

किसी पहाड़ी में जाकर ,

जोर से कहो ,

कोई नहीं भी सुनेगा तो ,

प्रकृति सुन लेगी ,

और मन , दिमाग , शरीर ,

सब हल्का होकर ,

आराम देगा ,

खाली हुई जगह में ,

नई ऊर्जा और ,

नया सामर्थ्य भरेगा,

मन से ,

दिमाग से ,

गुबार निकाल देने वाले ,

अक्सर ज्यादा जीते है ,

और स्वस्थ रहते है।    

Monday, December 8, 2025

अंतिम मुलाक़ात

 

बहुत कुछ कहना था उस मुलाकात में ,

जिसे हम अंतिम मुलाकात कह रहे थे ,

अगले दिन से हमने अलग -अलग रास्ते चुन लिए थे ,

मर्ज़ी से , उसे कोई शिकायत थी , मुझे कोई गिला ,

हमें पता था यही तक का सफर है हमारा ,

उसे आगे बढ़ जाना था और मेरा सफ़र भी जुदा था ,

दोनों के बीच कोई कड़ुवाहट नहीं थी ,

थे तो वो पुराने बेहतरीन दिन , जो हमने बिताये थे ,

हमारे बीच उस दिन ख़ामोशी ज्यादा थी ,

शायद अल्फाज कम पड़ रहे थे ,

मुस्कराहट के साथ हमने इक दूसरे को अलविदा कहा ,

और अपने -अपने रास्ते चल दिये ,

मुड़ -मुड़कर देखते रहे जब तक ओझल हो गये

एक ख़ालीपन सा जीकर उस रात ,

हमारे रास्ते अलग -अलग हो गये ,

इस आस फिर भी बनी रही ,

वो हमारी "अंतिम मुलाकात " साबित हो।

Thursday, December 4, 2025

दिसंबर

 

सर्द शुरुआत हुई थी ,

सर्द ही अब समाप्त होगा ,

आलम - - दिसंबर ये है ,

जनवरी का लिया हुआ इक ,

अधूरा प्रण बरबस दिल पर ,

नोक की तरह चुभ रहा है। 

 

समझा रहा हूँ बार -बार ,

नये साल पर फिर दोहराऊँगा ,

यह साल तो बीत गया अब ,

कोशिश करूँगा अगले साल ,

प्रण को हरगिज निभाऊँगा ,

दिमाग हँस रहा है , कह रहा ,

मत करना कोई प्रण नये साल। 

Wednesday, November 26, 2025

पैसा

 

पैसा बहुत जरुरी है ,

नितांत जरुरी है ,

जो कहते है - मोहमाया है ,

ये कहने के लिये भी ,

पल्ले में पैसा जरुरी है। 

 

जो कहते है ,

पैसा सब कुछ नहीं है ,

कपट झूठ बोलते है ,

ऐसा कहने के लिये ,

वो भी पैसा लेते है।

 

अर्थ के बिना ,

जीवन जीना अनर्थ है ,

हाँ , इक बार पैसा आ जाये ,

फिर ज्ञान देने का ,

अलग अर्थ है।  

 

पैसा भले ही शांति ,

सुकून की गारंटी न दे ,

मगर वो सब कुछ दे सकता है ,

जो आज के लिए जरुरी है,

जरुरत पूरी करने के लिये ,

पैसा कमाना मजबूरी हैं। 

Sunday, November 23, 2025

जेन ज़ी कविता

 

बातों ही बातों में कल मेरी बेटी बोली ,

पापा अब नई कवितायें लिखनी होगी ,

वैसे भी हमारी जेनेरशन कवितायें पढ़नी भूल रही ,

उनके हिसाब से अब लिखनी होंगी।

 

मन विचलित, मस्तिष्क परेशान ,

कहाँ से लाऊँ अब ये ज्ञान ,

मगर अब जुड़ना होगा तो ,

इस दौर की कवितायें लिखनी ही होंगी।

 

लगे हाथ उसने दे दिया एक सुझाव ,

आई का इस्तेमाल करो ,

प्रोम्प्ट देकर उससे अब ,

अपनी कवितायें रचने को कहो।

 

अब कवितायें भी आई लिख देगा ,

कवियों अब तुम्हारा क्या होगा ,

मानवीय संवेदनाओ को अब ,

आई अपने कृत्रिम भावों से सीचेंगा।

 

एक ही प्रोम्प्ट पर अलग -अलग रस की ,

वो झटपट नौ कवितायें रच  देगा ,

" आनन्द " तुम खेती करना सीखो अब ,

कवितायें तो तुमसे बेहतर आई लिख देगा।

Saturday, November 15, 2025

बूढ़ी अम्मा

 

पहाड़ सी ज़िन्दगी हो गयी ,

सब कुछ होते हुए भी कुछ न था ,

सब छोड़कर अकेले उसे ,

पहाड़ ही कर गए थे। 

 

जिद्दी अम्मा भी थी ,

कितना समझाया था उसे ,

चली जा तू भी वही ,

न जाने क्यों पहाड़ों से इतना लगाव था। 

 

हिस्से उसके संघर्ष के क्या आया था ,

रोज़ पहाड़ जैसी मुसीबतें ,

उकाव -हुलार चढ़ते -उतरते ,

हाथों से लकीरें भी गायब थी। 

 

अम्मा रोज़ डूबते सूरज को ,

हुक्का पीते हुए निहारती थी ,

आज रात ही निकल जाये प्राण ,

अगले दिन खेतों में मिलती थी। 

 

अपने बाड़ -खुड़ों से उसे अथाह प्रेम था ,

किसी में पालक , किसी में प्याज ,

नन्ही -नहीं क्यारियों में कपोल फूटती थी ,

अम्मा मन ही मन संतुष्ट होती थी। 

 

लौकी और गद्दुऐ सूखा रखे थे घर की छत पर,

 पीली ककड़ियों  की बड़िया बनाती थी ,

खुद का कल का पता नहीं था ,

पूरे ह्यून बिताने का इंतजाम करती थी। 

 

एक दिन सच में रात को सोई ,

सुबह उठी ही नहीं ,

बड़िया छत में ओंस में भीग गयी ,

और पालक तुश्यार से मुरझा गयी। 

 

अम्मा चुपचाप चली गयी ,

और सब कुछ छोड़ गयी ,

बच्चे भी अम्मा की चिंता से फरांग हो गये ,

गाँव वालों ने कहा - बुढ़िया तर गयी। 

 

Friday, November 14, 2025

लोकतंत्र में चुनाव


प्रतिनिधि चुनना है , 

जो काम आये लोगों के ,

जो सरकार से बात करे , 

सरकार में शामिल होकर , 

जो जान सके दुःख दर्द , 

जो नब्ज पकड़ सके वक्त -बेवक्त , 

वही जीतना चाहिये , 

उसी को जीताना चाहिए , 

यही है लोकतंत्र का , 

सबसे बड़ा मूलमंत्र , 

अब चुनाव में , 

कौन जीतता है ? 

कौन हारता है ? 

इसके बहुत से है कारक , 

जनता तो उसे ही चुनेगी , 

जिससे लगेगा , 

वक्त पर सुनेगा बात , 

वर्ना जनता तो अपना दुखड़ा , 

रो ही रही है सालों से , 

सुनता कौन है ? 

एक बार चुनाव जीतकर , 

मगर लोकतंत्र की तो आत्मा बसी है चुनावों पर , 

होते रहेंगे जनता से , जनता के लिये , जनता द्वारा , 

जायेंगे सरकार में चुने हुए उम्मीदवार , 

अब उनपर निर्भर , 

कितना अनसुना करेंगे , कितना सुनेंगे , 

आयेंगे फिर लौट कर, 

फिर कहाँ जायेंगे बचकर।  

Saturday, November 1, 2025

संघर्ष

 

यकीन जानिये ,

संघर्ष सबकी ज़िन्दगी में है ,

वो बात अलग है ,

सबके संघर्ष का स्तर अलग -अलग है। 

 

कोई संघर्ष से निखरता है ,

कोई संघर्ष से बिखरता है ,

कोई टूट जाता है ,

कोई नई परिपाटी गढ़ जाता हैं। 

 

बिना संघर्ष के जो पाता है ,

उसे क्या पता स्वाद संघर्ष का ,

भुरभुरा सा ज़िन्दगी भर ,

इक नन्ही ठोकर से बिखर जाता हैं। 

 

जो खड़ा रहता है संघर्षो में सीना तान ,

फिर उसके लिए क्या आँधी -तूफ़ान ,

तैयार हर परिस्थिति के लिये ,

शून्य से फिर खड़ा कर देता है मुकाम। 

 

जो बाधाओं से लड़ता है ,

जो संघर्षो में तपता है ,

वही निखर कर इक दिन ,

जग में "हीरे" सा दमकता हैं। 

 

डटा रहा अंतिम समय तक ,

वक्त तेरे लिये फिर थम जायेगा ,

तेरे जूनून की जिद्द में ,

जमीन क्या आसमां भी झुक जायेगा।

Tuesday, October 28, 2025

आँसू

 

जब हम सबसे ज्यादा उदास होते है ,

हमें हमारे सबसे अच्छे दिन याद आते है ,

आँखों की कोरे गीली हो जाती है ,

और यादें आँसू रूप में ढल कर ,

हमारे गालों से लुढ़ककर ,

जमीन को स्पर्श करते है ,

हम गलती करते है ,

अपने हाथों से उनको पोछने लगते है ,

बहने दीजिये उन आँसुओं को ,

मिलने दीजिये जमीन से ,

ये जमीन उन आँसुओं को ,

बीज रूप में ग्रहण करती है ,

और आपके अवसादों को ,

उदासियों को सोखकर ,

आपके लिये आशाओं का ,

उम्मीदों की एक नई पौध जनती  है ,

और आपके एक एक आँसुओ को ,

फूल बनाकर आपके जीवन में बिखेरती है।