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Tuesday, October 3, 2017

यादो का गलियारा


उन गलियों में जाना हुआ , 
जहाँ कभी हमारी सपनो की दुनिया बसती थी , 
उन पगडंडियों में फिर कदम पडे , 
जिन पर जगह जगह हमारे बनाये निशान अब भी पड़े थे।  

उस नदी के ऊपर पुल से गुजरना हुआ , 
जिस नदी को हम पैंट को घुटने तक मोड़कर हँसते पार करते थे , 
उस मैदान से रूबरू हुए , 
जिस मैदान पर हम कभी चौक्के - छक्के लगाते थे।  

उस शिवालय के आगे से गुजरना हुआ , 
जिसमे हम कभी घंटो बैठ भागवत सुना करते थे , 
उस चाचा से बात हुई , 
जिसके पेड़ो के फल हम चुराये करते थे।  

वो  चीड़ के पेड़ को भी देखना हुआ , 
जिसमे कभी हम खुरच कर अपना नाम खोद आये थे , 
नाम अभी भी लिखा हुआ था , 
मगर अक्षर अब बड़े हो चुके थे। 

वो पहाड़ की चोटी को चढ़ने की हिम्मत न हुई ,
जिसमे हम कभी न जाने दिन में कितनी बार चढ़ जाते थे ,
वो सीढ़ीनुमा खेत जो अब डराते है ,
कभी हम उनमे कूदम - कूद खेलते थे।  

नजरे  उन तमाम यादो को ढूँढ रही थी , 
जो कही न कही दिमाग में बहुत गहरी थी , 
लगा जैसे वक्त का पहिया रुक सा गया , 
मेरा बचपन , मेरा गाँव  मुझे फिर से मिल गया।  


1 comment:

  1. Superb..............apne gaon , apne pahad jaate rahna chahiye.

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