Tuesday, October 24, 2017

कैसे कहूं - ज़िंदा है हम

मन बेचैन ,
दिमाग में उथल पुथल
दौड़ता भागता तन ,
न इधर , न उधर
भविष्य की चिंता में ,
आज पिस रहा ,
बिताये अच्छे दिनों की याद ,
आँखों की कोरे नम 

हाय ! ये कैसा जीवन,   

कैसे कहूं - ज़िंदा है हम।

किसी दूसरे की परवाह नहीं ,
अपने संकटो से ही जूझ रहा मन ,
टिक टिक समय बीत रहा ,
न इधर के , न उधर के रहे हम। 

भावनाओ के लिए वक्त नहीं ,
कुंठा उठाये रखे है फन ,
जितना पास है उसमे संतोष नहीं ,
पता नहीं क्या चाहता है मन। 

हाय ! ये कैसा जीवन,   
कैसे कहूं - ज़िंदा है हम।

बनावटी हँसी अधरों में ,
नहीं पसीजता किसी की लाचारी पर मन ,
बाहर से जितना कठोर बनता ,
अंदर सारा खोखलापन। 

स्वार्थ हर जगह पैर पसारे ,
रिश्ते नाते निभा रहे बेमन ,
झूठी शान का बढ़ रहा चलन ,
लालच घर कर रहा ,
ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी की दुश्मन 

हाय ! ये कैसा जीवन। 
कैसे कहूं - ज़िंदा है हम।

2 comments:

  1. सच मशीनी होती जिंदगी के बीच जिंदगी कैसी
    बहुत सही

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  2. वाह क्या बात मेहरा साहब

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