Tuesday, July 4, 2023

अल्हड़पन

 

बात अलग थी उस अल्हड़पन में ,

जब मौजो का इक दरिया बहता था ,

खाली होती थे जेब हमारी ,

दरियादिली का समंदर बहता था। 

 

मंजिल का पता नहीं था मगर ,

बेमकसद घूमना एक शगल था ,

नफे -नुकसान की किसको परवाह थी ,

हर शक्ल में इक दोस्त दिखता था।

 

आसमां को मुट्ठी में करने की ललक थी ,

हवाओं से बातें अक्सर होती थी ,

पता नहीं था -क्या होगा भविष्य में ,

पल -पल जी लेने की अजब हसरत थी। 

 

चाँद को आगोश में लेने का सपना था ,

सूरज से आँखे मिलाने की जुर्रत  थी ,

इक नन्हा सा ख्वाब पलता था आँखों में ,

हमारी कागज़ की नाव पानी में तैरती थी। 

 

खुली आँखों में कुछ सपने थे,

हर सपने की इक हरारत थी ,

कहाँ परवाह थी तूफानों की ,

तूफानों से अपनी नूरा -कुश्ती थी। 

 

नियम -कानून सब बासी लगते थे ,

विद्रोह की चिंगारी सुलगती थी ,

अम्मा -बाबूजी की सुलझी बातें,

दिमाग में उलझन पैदा करती थी।  

 

बात अलग थी उस अल्हड़पन में ,

जब मौजो का इक दरिया बहता था ,

खाली होती थे जेब हमारी ,

दरियादिली का समंदर बहता था।