Friday, October 2, 2026

बैचैन मन

 

हालातों पर करीब से निगाह रख रहा हूँ,

जिधर देखूँ, उधर बेचैनी देख रहा हूँ,

भागते फिरते सबको इधर-उधर,

सबको कुछ न कुछ खोजता देख रहा हूँ।

 

कुछ तो छिपा हुआ है कहीं,

दौड़ का अजब दौर देख रहा हूँ,

बदहवास हुए हैं सारे लोग,

माथों पर गहरी शिकन देख रहा हूँ।

 

देख रहा हूँ अजीब-से मंजर,

संशय के बादल घिरे देख रहा हूँ,

न जाने कहाँ खो गई विश्वास की डोर,

हर नज़र में संदेह भरे देख रहा हूँ।

 

हर कोई अनजानी मंज़िल की ओर,

बिना जाने ही बढ़ता देख रहा हूँ,

किसी को समय से आगे भागते,

किसी को समय से लड़ते देख रहा हूँ।

 

हाथों में सबके साधन बहुत हैं,

फिर भी खाली मन देख रहा हूँ,

हँसी चेहरों पर सजी हुई है,

आँखों में छिपी नमी देख रहा हूँ।

 

रिश्ते भी अब सवालों में हैं,

हर बात को तौलते देख रहा हूँ,

अपने ही अपनों से बचते फिरते,

विश्वास को सिसकते देख रहा हूँ।

 

राजनीति का गिरता स्तर देख रहा हूँ ,

नेताओं को गिरगिट बनते देख रहा हूँ ,

पार्टियों के चक्कर में ,

भाई -भाई के बीच झगड़ा देख रहा हूँ। 

 

देख रहा हूँ इस दौर को,

उम्मीद को भी पलते देख रहा हूँ,

अँधेरा चाहे जितना गहरा हो,

दूर कहीं उजाला देख रहा हूँ।

Sunday, September 27, 2026

यूँ ही तो नहीं हुआ होगा

 

किसी की नीयत तो डोली होगी,

ताले ऐसे ही नहीं आये होंगे।

 

कोई तो पलटा होगा अपनी जुबान से,

हस्ताक्षर का रिवाज ऐसे ही नहीं बना होगा।

 

किसी के तो भाई के मन में उपजा होगा संदेह,

घर के बँटवारे यूँ ही नहीं हुए होंगे।

 

किसी ने तो की होगी पहली बेवफाई,

इश्क़ के किस्से यूँ ही मशहूर नहीं हुए होंगे।

 

किसी ने किया होगा वह पहला विद्रोह,

राजशाही यूँ ही तो नहीं गयी होगी।

 

किसी ने तो पहली बार उठाई होगी आवाज़,

खामोशियों में यूँ ही दरार नहीं पड़ी होगी।

 

किसी ने तो तोड़ा होगा भरोसा पहली बार,

रिश्तों में यूँ ही दीवार नहीं खड़ी हुई होगी।

 

किसी ने तो किसी अपने को ठुकराया होगा,

अपनों से दूर जाने की वजह यूँ ही नहीं बनी होगी।

 

किसी ने तो देखे होंगे अपनों के बदलते चेहरे,

आँखों में नमी यूँ ही नहीं उतरी होगी।

 

किसी ने तो चाहा होगा बदलना ज़माने को,

हर नई सोच यूँ ही तो नहीं जगी होगी।

 

किसी ने तो सहा होगा दर्द हद से ज़्यादा,

क्रांति की चिंगारी यूँ ही नहीं भड़की होगी।

Friday, September 18, 2026

सार

 

गोया हसरतों की दौड़ है ,

उम्मीदों का तो दम फूल रहा है ,

सपनों की फेहरिस्त लंबी है ,

और शरीर बोल रहा है। 

 

समय और अक्ल की भेंट ,

सही समय पर होती तो ,

शायद कुछ और बात होती ,

अक्ल का अब अचार डल रहा है। 

 

दिल तो अब भी जोर मारता है ,

लाचार तो घुटनों का दर्द करता है ,

ख्वाइशें अकेले तो आती नहीं ,

तजुर्बों का सार संभाल लेता है। 

Tuesday, September 8, 2026

मन की बात

थका-हारा लौट आया, अपने किराये के द्वार,
कंधों पर दिनभर की थकान, सीने में वर्षों का भार।
पत्नी की आँखों में प्रश्न था, बच्चों के चेहरे उदास,
वह मुस्कुराकर कह गया—“कुछ नहीं”, छुपाकर मन की बात।

कितना अजीब है आदमी, दर्द भी उसका अपना नहीं,
रोना चाहता है मगर आँखों को रोने की इजाज़त नहीं।
कुछ सपने रास्तों में छूटे, कुछ रिश्ते हुए अनजान,
कुछ अपने केवल नाम के, कुछ रह गए यादों के मेहमान।

रोटी, किराया, बच्चों की पढ़ाई—जिम्मेदारियाँ तमाम,
अपने हिस्से की धूप छोड़कर, सबके लिए ढूँढ़ता रहा शाम।
जिस नौकरी पर कभी गर्व था, अब वही मजबूरी है,
गिरने से डरता है क्योंकि नीचे कोई बाँह नहीं, कोई दूरी नहीं।

रात ढले जब घर सोता है, वह खिड़की पर बैठा रहता है,
बीते हुए अपने दिनों से चुपचाप बातें करता रहता है।
आईना चेहरा दिखाता है, भीतर का दर्द नहीं,
आँखों की नमी पढ़ सके—ऐसा कोई अपना नहीं।

तकिये पर गिरा एक आँसू, बरसों की कहानी कह गया,
जिसे दुनिया मजबूत समझती थी, वह भीतर से कहीं बह गया।
टूटकर भी टूट नहीं सकता, रोकर भी रो नहीं सकता,
हारकर भी हार नहीं सकता—क्योंकि अपनों को खो नहीं सकता।

कभी मन करता है कह दे—“आज मुझे संभाल लो,
आज मुझे मजबूत मत समझो, बस थोड़ा-सा थाम लो।”
मगर फिर सुबह होती है, वह चेहरे पर मुस्कान रखता है,
और अपने ही टूटे मन को समझाकर फिर काम पर निकलता है।

जिसने पूरी उम्र सबको गिरने से बचाया,
उसे गिरने के लिए भी कोई कंधा न मिल पाया।
बस एक सवाल आज भी उसके भीतर चुपचाप जलता है—
“
जब अपना ही मन भारी हो, तो कहें किससे मन की बात?”