मैं ताउम्र
ज़िंदगी के विद्यालय का
एक छात्र ही रहूँगा,
रोज़ एक नया पाठ पढ़ूँगा,
पुराने पाठ दोहराऊँगा,
और फिर भी
किसी न किसी परीक्षा में
अनुत्तीर्ण होता रहूँगा।
इस विद्यालय में
उत्तीर्ण होना सरल नहीं है,
यहाँ प्रश्नपत्र
परीक्षा से पहले नहीं मिलता,
और उत्तर
अक्सर परीक्षा के बाद समझ आता है।
यहाँ
ठोकरें शिक्षक हैं,
अनुभव पाठ्यपुस्तक,
समय प्रधानाचार्य
और परिस्थितियाँ
सबसे कठिन परीक्षक।
कुछ पाठ
दूसरों की गलतियों से सीखेंगे,
कुछ अपनी गलतियों से,
और कुछ ऐसे होंगे
जिनकी कीमत
पूरी उम्र चुकानी पड़ेगी।
कभी रिश्ते पढ़ेंगे,
कभी रिश्ते खोकर समझेंगे,
कभी सफलता पर इतराएँगे,
कभी असफलता से टूटेंगे,
और फिर उसी टूटन से
खुद को जोड़ना सीखेंगे।
इस विद्यालय की सबसे बड़ी विडंबना है,
यहाँ अंतिम परीक्षा
तब होती है,
जब विद्यार्थी
परीक्षा देने के योग्य ही नहीं रहता।
इसलिए
अब उत्तीर्ण होने की चाह नहीं,
बस इतना प्रयास है,
कल का मैं
आज से थोड़ा बेहतर हो,
कुछ कम अहंकारी,
कुछ अधिक समझदार,
और थोड़ा अधिक इंसान हो।
क्योंकि
ज़िंदगी के इस विद्यालय में
डिग्री किसी को नहीं मिलती,
सिर्फ अनुभव मिलता है,
और अंत में
वही हमारी
सबसे बड़ी योग्यता बनता है।