जो मिला है, उसमें चैन नहीं,
जो नहीं मिला, उसी की तलाश है।
अपने आँगन के फूलों को भूलकर,
दूसरों के बाग़ की प्यास है।
तुलनाओं की इस अंधी दौड़ में,
वह खुद से ही दूर होता जाता है,
ईर्ष्या की आग में जल-जलकर,
अपना ही सुकून खोता जाता है।
ना उसे अपने हिस्से की धूप भाती है,
ना अपने चाँद की चाँदनी,
बस दूसरों के उजालों को देखकर,
मन में भर लेता है वीरानी।
समझ ले वो गर एक बात ,
ज़िन्दगी हो जायेगी कितनी आसान ,
सबका अपना नसीब और कर्मों का लेखा,
गाँठ बांध ले गर वह यह ज्ञान।
इंसानी फ़ितरत सच में कमाल की है,
पर सुधर जाये तो वरदान है,
अपने सुख को पहचान ले जो,
उसी का जीवन महान है।