Friday, February 13, 2026

वक्त

 


वक्त सबको वक्त देता है ,

वक्त को सब अपना वक्त नहीं देते ,

जो देते है , वो वक्त का साथ पाते है ,

जो नहीं देते , उनका वक्त निकल जाता है। 

 

वक्त की सबसे अच्छी चीज ये है " आनन्द ",

ये सदा के लिये किसी एक के पक्ष में नहीं रहता ,

बदलने की फितरत रही है सदा इसकी ,

देर सबेर आता हरेक के हिस्से जरूर हैं। 

 

कभी झटके में बदल जाता है ,

किसी को बेइंतेहां इन्तजार करवाता है ,

परीक्षा लेता है ठोक -बजाकर ,

जब आता है , फिर सिर ताज सजा देता है। 

 

वक्त कभी अच्छा या बुरा नहीं होता ,

सब परिस्थितियों का खेल होता है ,

लगता है वक्त को भी समीकरण बदलने में ,

वक्त को भी थोड़ा वक्त चाहिये होता है। 

 

Wednesday, February 11, 2026

बसंत

 


 

आओ बसंत , छा जाओ बसंत ,

कुम्हला रही कपोलों में प्राण भरो बसंत ,

रूखी हवाओं में ताप भरो बसंत ,

निर्मोही मन में बासन्ती रंग भरो बसंत। 

 

सुप्त पड़ी धरा को उष्मित करो बसंत ,

सूखी डालियों को फिर लहलहाओ बसंत ,

कलरव का संगीत बजाओ बसंत ,

मुरझाये से मन में फाग भरो बसंत। 

 

Friday, February 6, 2026

एप्सटीन फाइल्स


खुल रहा पिटारा एप्सटीन का , 

बेनकाब हो रहे चेहरे सारे , 

सफेदपोश चेहरों के नकाब, 

खुल रहे है धीरे -धीरे।  


क्या राजनेता , क्या अभिनेता , 

क्या व्यापारी , क्या खिलाडी , 

एप्सटीन के लिटिल सेंट जेम्स द्वीप में , 

एक ही हमाम में नंगे सारे।  


सत्ता के मद में चूर , 

दौलत के नशे में डूब , 

अय्याशी के अड्डे में , 

भूले सब कायदे -कानून। 


परत दर परत खुल रही , 

उड़ रही अब सब धूल , 

एप्सटीन तुम माहिर निकले , 

दे गये सबको घाव नासूर।   

Friday, January 30, 2026

समय यात्रा

 

हम समय की अनवरत यात्रा के ,

किसी पड़ाव पर साथ देने वाले ,

वो सूक्ष्तम सहभागी है जो ,

यदि कभी समय यात्रा की ,

रेखा में शायद अणु से भी छोटे रहेंगे ,

मगर इस यात्रा में जहाँ से ,

हम शामिल हुए है और ,

जितना भी समय हमें इसका ,

सहयात्री बनने का मिला ,

उस समय हम इस यात्रा में ,

कितना इसका साथ दे गए ,

और कितना यात्रा को आयाम दिये ,

यही हमारी छोटी सी यात्रा की ,

अनंत समय यात्रा को देन है ,

सफलता है , योगदान है। 

Friday, January 16, 2026

ज़िन्दगी का पंचनामा

 

शब्दों में "शोर " हो चला हूँ ,

शहरों में "दिल्ली " हो चला हूँ ,

माँग रही है हिसाब किताब ज़िन्दगी ,

"उम्मीद" का लॉलीपॉप थमा रहा हूँ।

 

देहरी छोड़ी, घर छोड़ा, गाँव छोड़ा,

दोस्त छोड़े , परिवार छोड़ा ,

कुछ बड़ा करने के चक्कर में ,

"शहरों " में धक्के खा रहा हूँ।

 

जीविका के लिये " नौकरी " में हूँ ,

जी -हुजूरी से उकता गया हूँ ,

ज़िन्दगी कट रही है नौ से छः के फेर में ,

रविवार को ही जैसे हफ्ता जी रहा हूँ।

 

"धोखे " की इक ज़िन्दगी गुजर रही है ,

सुलझने की बजाय और उलझ रही है ,

भ्रम है फुर्सत मिलेगी आगे चलकर,

उम्र धीरे धीरे उम्रदराज हो रही है।

Wednesday, January 7, 2026

उसूल

  

दूसरों के लिए होते है उसूल ,

अपने लिये लगते है फ़िजूल ,

दुनिया में सामर्थ्यवान ही सब कुछ है ,

नैतिकता है इनके लिये धूल।

 

कटु सत्य तो ये है ज़माने का ,

पैसे और रुतबे का ही है खेल सारा ,

जपते रहो मानवता का पाठ बराबर ,

वो आयेंगे और बदल देंगे खेल सारा।

 

खेल सारा इस पार और उस पार का है ,

इस पार ज्यादा है , उस पार कम है ,

षड़यंत्र ऐसा , जिसकी कोई थाह नहीं ,

कम वालों का ज्यादा पर नियंत्रण सारा है।

Saturday, December 20, 2025

कहो

 


कहो ,

जो दिल में है , कहो,

कोई सुनने वाला न भी हो ,

तब भी कहो ,

अनकही बातें ,

दिल से होते हुए ,

दिमाग में घुस जाती है ,

और कारण बन जाती है ,

अवसादों के ,

और अवसाद में पड़कर ,

धीरे -धीरे शरीर भी ,

कमजोर होने लगता है ,

कहो ,

कोई न मिले ,

तो दीवारों से कहो ,

किसी पहाड़ी में जाकर ,

जोर से कहो ,

कोई नहीं भी सुनेगा तो ,

प्रकृति सुन लेगी ,

और मन , दिमाग , शरीर ,

सब हल्का होकर ,

आराम देगा ,

खाली हुई जगह में ,

नई ऊर्जा और ,

नया सामर्थ्य भरेगा,

मन से ,

दिमाग से ,

गुबार निकाल देने वाले ,

अक्सर ज्यादा जीते है ,

और स्वस्थ रहते है।    

Monday, December 8, 2025

अंतिम मुलाक़ात

 

बहुत कुछ कहना था उस मुलाकात में ,

जिसे हम अंतिम मुलाकात कह रहे थे ,

अगले दिन से हमने अलग -अलग रास्ते चुन लिए थे ,

मर्ज़ी से , उसे कोई शिकायत थी , मुझे कोई गिला ,

हमें पता था यही तक का सफर है हमारा ,

उसे आगे बढ़ जाना था और मेरा सफ़र भी जुदा था ,

दोनों के बीच कोई कड़ुवाहट नहीं थी ,

थे तो वो पुराने बेहतरीन दिन , जो हमने बिताये थे ,

हमारे बीच उस दिन ख़ामोशी ज्यादा थी ,

शायद अल्फाज कम पड़ रहे थे ,

मुस्कराहट के साथ हमने इक दूसरे को अलविदा कहा ,

और अपने -अपने रास्ते चल दिये ,

मुड़ -मुड़कर देखते रहे जब तक ओझल हो गये

एक ख़ालीपन सा जीकर उस रात ,

हमारे रास्ते अलग -अलग हो गये ,

इस आस फिर भी बनी रही ,

वो हमारी "अंतिम मुलाकात " साबित हो।