Monday, August 31, 2026

रफ़्तार


जिस रफ़्तार पर हम सवार हुए हैं,

वो रफ़्तार एक दिन हमें

औंधे मुँह गिरायेगी।

बड़ा सरल नियम है गति का,

संतुलन बनाये रखना बहुत ज़रूरी।


हर विकास की कीमत होती है,

कितनी होगी?

ये प्रकृति तय करेगी।

विरोधाभास यह है, "आनंद",

हमारे और प्रकृति की नहीं जमती।


हमने पहाड़ों को काट दिया,

नदियों को बाँध दिया,

जंगलों को उजाड़ दिया,

और फिर हम कहते हैं ,

प्रकृति हमारी मुट्ठी में है।


हमने आसमान छूने की चाह में

धरती को पीछे छोड़ दिया,

समंदर की गहराइयों में उतर गये,

चाँद पर घर बनाने कवायद शुरू कर दी,

पर अपने भीतर उतरना भूल गये।


शहर बढ़ते गये,

पेड़ घटते गये,

सड़कें चौड़ी होती गयीं,

रास्ते छोटे होते गये,

मकान ऊँचे होते गये,

आँगन छोटे होते गये।


रफ़्तार ने बहुत कुछ दिया,

मगर बहुत कुछ छीन भी लिया,

समय बचाने की कोशिश में

हमने जीना ही कम कर दिया।


अब हवा भी हिसाब माँगती है,

नदियाँ सवाल करती हैं,

पेड़ ठूँठ बन उदासी से ,

हमारी तरक्की देखते हैं,

और मौसम हर साल

अपना रंग बदलकर

हमें चेतावनी देता है।


शायद विकास बुरा नहीं है,

बुरी है उसकी दिशा,

बुरी है वो अंधी दौड़

जिसमें मंज़िल से ज्यादा

रफ़्तार मायने रखने लगे।


ज़रूरत है थोड़ा ठहरने की,

थोड़ा सोचने की,

धरती की धड़कन सुनने की,

क्योंकि ये धरती

सिर्फ हमारी नहीं है।


रफ़्तार रखो,

मगर संतुलन के साथ,

विकास करो,

मगर प्रकृति के साथ।


क्योंकि जिस दिन

प्रकृति ने अपनी रफ़्तार पकड़ ली,

उस दिन इंसान की

सारी रफ़्तार छोटी पड़ जायेगी।


और तब शायद

हम समझ पायेंगे ,

ज़िंदगी दौड़ने का नाम नहीं,

संतुलन के साथ

चलते रहने का नाम है।

Tuesday, August 18, 2026

बारिश

 

किसी ने कहा

खूब बारिश हुई,
झमाझम हुई,
इतनी हुई
कि सब पानी-पानी हो गया।

जब पूछा
कहाँ हुई?

उसने कहा
समंदर में।

किसी ने पूछा
कितना विकास हुआ?

बहुत हुआ,
हर तरफ़ हुआ,
चारों ओर हुआ।

उसने पूछा
कहाँ हुआ?

देखो ज़रा,
नेताओं और चमचों के
बड़े-बड़े घरों में हुआ।

किसी ने पूछा
जनता को क्या मिला?

जनता को तो देना है
वोट,
टैक्स,
और अपनी चुप्पी।

बारिश हुई
समंदर भर गया,

विकास हुआ
महल भर गए,

और जनता?

वह आज भी
बादलों को देख रही है-
इस उम्मीद में
कि शायद अगली बारिश
उसके घर की छत पर होगी।

लेकिन बारिश की बूँदें भी
शायद रास्ता जानती हैं-
समंदर का।


Monday, August 17, 2026

बेचैनियाँ

 

एक अजीब सी,

बेचैनी पल रही है,
मन के भीतर,
एक अजीब सा,
सन्नाटा पसरा है,
शोरगुल के अंदर।

एक अजीब सा,
अकेलापन है,
हर आदमी के भीतर,
एक अजीब सी,
कसक है,
हर दिल के अंदर।

एक अजीब सा,
उतावलापन है,
हरेक शख़्स के भीतर,
एक अजीब सा,
खालीपन है,
सबके दिल के अंदर।

कोई दौड़ रहा है,
किसी मंज़िल की तलाश में,
कोई ठहर गया है,
अपने ही सवालों के पास में।
चेहरे पर मुस्कान है,
आँखों में नमी छुपी है,
हर किसी की अपनी,
एक कहानी दबी है।

Friday, August 7, 2026

सोशल मीडिया एल्गोरिदम

 

सोशल मीडिया एल्गोरिदम , कृपा बरसाओ ,

इंस्टा पर मेरे लिखे बढ़वाओ ,

फेसबुक में नये फॉलोवर दिलाओ ,

यूट्यूब के सब्सक्राइबर बढ़ाओ। 

 

मैं रोज़ नया कंटेंट बनाऊँगा ,

हर ट्रेंड पर वीडियो अपलोड करुँगा ,

लाइक , सब्सक्राइब और फॉलोवर के लिये ,

हर तरकीब अपनाऊँगा। 

 

बस एक बार अपनी नजर घुमाओ ,

मेरी भी थोड़ी रीच बढ़ाओ ,

अपने एल्गोरिदम का जादू चलाओ ,

हर पोस्ट पर मिलियन व्यूज दिलाओ। 

 

आई का कोई कमाल दिखाओ ,

एक प्रोम्प्ट से कंटेंट वायरल कराओ ,

मुझे भी इन्फ्लुएंसर का ताज दिलाओ ,

ब्लू टिक का सपना सच कराओ। 

Wednesday, August 5, 2026

मन के अंतरतल में

 

मन के अंतरतल में यादों के दरख़्त गहरे,

उम्मीदों के सफ़र में यायावर चल धीरे-धीरे,

वक़्त एक बँधा हुआ है तेरे संग,

मौज से ख़र्च कर, मुस्करा हौले-हौले।

 

धूप भी तेरी है, छाँव भी तेरी,

राह की हर ठोकर एक सीख है गहरी,

हर मोड़ पर ठहर, ज़रा ख़ुद से भी मिल,

ज़िंदगी खुलती है हौले-हौले।

 

जो बिछड़ गए, उन्हें दुआओँ में रहने दे,

जो मिल गए, उन्हें दिल में बसने दे,

हर रिश्ता मुकम्मल हो, ये ज़रूरी तो नहीं,

कुछ अहसास महकते हैं हौले-हौले।

 

ना मंज़िल की फ़िक्र में सफ़र खो देना,

ना कल की चिंता में आज रो देना,

जो पल हथेली पर आकर ठहर गया,

उसे जी भर जी ले हौले-हौले।

 

जब अंत में मुड़कर देखेगा यह कारवाँ,

दौलत, शोहरत करेगी बयाँ,

बस मुस्कानों की पूँजी साथ रहेगी ,

और मन कहेगा-खूब जिया हौले-हौले।

Friday, July 17, 2026

फितरत

 

जो मिला है, उसमें चैन नहीं,

जो नहीं मिला, उसी की तलाश है।

अपने आँगन के फूलों को भूलकर,

दूसरों के बाग़ की प्यास है।

 

तुलनाओं की इस अंधी दौड़ में,

वह खुद से ही दूर होता जाता है,

ईर्ष्या की आग में जल-जलकर,

अपना ही सुकून खोता जाता है।

 

ना उसे अपने हिस्से की धूप भाती है,

ना अपने चाँद की चाँदनी,

बस दूसरों के उजालों को देखकर,

मन में भर लेता है वीरानी।

 

समझ ले वो गर एक बात ,

ज़िन्दगी हो जायेगी कितनी आसान ,

सबका अपना नसीब और कर्मों का लेखा,

गाँठ बांध ले गर वह यह ज्ञान। 

 

इंसानी फ़ितरत सच में कमाल की है,

पर सुधर जाये तो वरदान है,

अपने सुख को पहचान ले जो,

उसी का जीवन महान है।