Friday, March 6, 2026

बसंत

 


मंद समीर सुहावनी, डोले तरु की डाल,
कोयल मीठे राग में, गाए नवल धमाल।

पीत वसन धरती धरे, सरसों हँसे अपार,
भ्रमर गुंजारें फूल पर, छाए मधु के हार।

नव पल्लव की छाँव में, जग का बदले रूप,
जीवन में आशा जगे, जैसे फैली बिखरी धूप।

ऋतुराज के आगमन से, खिल उठे सब प्राण,
प्रेम-सुगंधित हो उठे, मन, उपवन, और त्राण।

Thursday, March 5, 2026

सरहद की लकीरें

 

नादानों को क्या समझ सरहदों की,

सरहदें कभी कलरव रोक न सकीं,

हवाएँ, नदियाँ, पंछी — सब बेख़ौफ़ रहे,

सरहद तो बस इंसानों के डर की कीमत बनी,

कहता रहा इंसान खुद को सबसे अक्लमंद,

पर यह समझ न पाया अब तक ,

सबके हिस्से की यह धरती

अकेले उसकी कैसे हो गई?

 

कहते हैं — औरों से बचने के लिए

उसने समाज बनाकर रहना सीखा,

एक-दूसरे का हाथ थामकर

हर संघर्ष में जीना सीखा,

सीमित इच्छाओं में बाँटकर जीवन,

अपने अस्तित्व को बचाए रखा,

न जाने फिर उसी समाज में

सीमाएँ खींचने की अक्ल किसने दी?

 

चलो, मान लिया सीमाएँ ज़रूरी होंगी,

तो खींच दी गईं, नियम भी बन गए,

बिना इजाज़त प्रवेश पर पहरे बैठ गए,

कहा गया — अपनी हदो में ही रहो अब,

पर एक सवाल अब भी बाकी है ,

अगर लकीरें खींच ही दी थीं,

तो दूसरों की सरहदों में

नज़र गड़ाने की सीमा क्यों नहीं रखी?

 

शायद सरहदें ज़मीन पर नहीं,

इंसान के मन में खिंची हुई हैं,

जहाँ लालच की स्याही से

हर रोज़ नई लकीरें बनती हैं,

धरती तो आज भी सबकी है,

बस इंसान ही भूल गया है ,

कि आसमान की तरह

जीना भी बिना सरहदों के होता है।

Saturday, February 21, 2026

तराजू सा जीवन

 

जीवन इक तराजू सा देखा ,

दो पलड़े - सुःख -दुःख का लेखा ,

इक पलड़े में खुशियों की उजली धूप ,

दूजे में आँसुओं का भीगा रूप। 

 

जब सुःख का पलड़ा झुकता है ,

मन मयूरा सा नाचता है ,

रंग बिरंगे सपनों की छाया ,

हर दिशा में उजियारा पाता हैं। 

 

जब दुःख का पलड़ा भारी ,

जीवन दुश्कर सा लगता हैं ,

खुद को कोसने लगता है जीवन ,

चैन कहाँ फिर पाता हैं। 

 

दोनों का संतुलन ही जीवन है ,

यही सच्चा उसका साधन है ,

सुःख -दुःख के दोनों पलड़े ,

इन्ही में छिपा जीवन सार है। 

Wednesday, February 18, 2026

उम्मीद

 

कुम्ल्हा जाता है शीत में ,

सर्द हवाओं के थपेड़े झेलता है ,

गिरा देता है पत्तियाँ सब ,

बसंत की उम्मीद में जी जाता है। 

 

पहली बसंत की हवा में ,

कपोल फूट पड़ती है ,

ठूँठ सा बना पड़ा था जो ,

पत्तियों से तन ढाँक लेता है। 

 

फिर खिलने लगते है फूल ,

कलरव होने लगता है ,

झूम -झूम कर बासंती हवा में ,

सर्द हवाओं का खौफ भूल जाता हैं। 

 

फिर आता है तपिश का मौसम ,

सूरज आग बरसाता है ,

मुरझा जाती है पत्तियाँ डाल डाल ,

चौमास के इंतजार में जी जाता हैं। 

 

पहली फुहार में रोम रोम ,

फिर से जैसे जी उठता है ,

अठखेलियाँ सा करता बूँदो संग ,

लहराता सावन के गीत गाता हैं। 

 

साल दर साल का चक्र यह ,

नये -नये अनुभव कराता है ,

घबराओ मत -नन्हे पौधों ,

जीवन का पाठ खुद सीख, बताता हैं।  

Friday, February 13, 2026

वक्त

 


वक्त सबको वक्त देता है ,

वक्त को सब अपना वक्त नहीं देते ,

जो देते है , वो वक्त का साथ पाते है ,

जो नहीं देते , उनका वक्त निकल जाता है। 

 

वक्त की सबसे अच्छी चीज ये है " आनन्द ",

ये सदा के लिये किसी एक के पक्ष में नहीं रहता ,

बदलने की फितरत रही है सदा इसकी ,

देर सबेर आता हरेक के हिस्से जरूर हैं। 

 

कभी झटके में बदल जाता है ,

किसी को बेइंतेहां इन्तजार करवाता है ,

परीक्षा लेता है ठोक -बजाकर ,

जब आता है , फिर सिर ताज सजा देता है। 

 

वक्त कभी अच्छा या बुरा नहीं होता ,

सब परिस्थितियों का खेल होता है ,

लगता है वक्त को भी समीकरण बदलने में ,

वक्त को भी थोड़ा वक्त चाहिये होता है।