Tuesday, October 6, 2026

दोष

 

 हमारा दोष गिना जायेगा,

उस दिन जिस दिन हिसाब होगा।

दोषियों में हमें भी गिना जायेगा,

क्यूँकि हमने सब देखते हुए आँखें बंद की थीं,

सब कुछ सुनते हुए भी चुप्पी साधी थी।

 

हम जानते हुए भी अनजान रहे,

सच सामने था,

फिर भी उससे नज़रें चुराते रहे।

अन्याय हमारे सामने होता रहा,

हम देखते रहे,

सुनते रहे,

और भागीदार बने रहे।

 

तो फिर

दोषी ठहराने का उनका हक़

हम कैसे छीन सकते हैं?

 

उस दिन शायद

हमारे पास कहने को बहुत कुछ होगा

डर था,

मजबूरी थी,

हालात ठीक नहीं थे,

हम अकेले क्या कर लेते...

 

लेकिन क्या सचमुच

हम इतने मजबूर थे?

 

या फिर

हमने अपनी सुविधा को

सच से बड़ा मान लिया था?

 

हमने सोचा

आवाज़ उठायेंगे तो

मुसीबत हमारे दरवाज़े तक आयेगी,

इसलिए चुप रहे।

 

हमने सोचा

कोई और बोलेगा,

इसलिए चुप रहे।

 

हमने सोचा

हमारा क्या लेना-देना?

और इसी सोच में

किसी और का सब कुछ लुटता रहा।

 

हम भूल गये थे

अन्याय सिर्फ़ करने वाला नहीं करता,

कभी-कभी

देखने वाला भी उसका हिस्सा बन जाता है।

 

क्योंकि अपराध करने के लिए

हाथ उठाना ही ज़रूरी नहीं,

कभी-कभी

सही समय पर हाथ न उठाना भी

एक अपराध होता है।

 

और मौन,

जिसे हम अपनी सुरक्षा समझ रहे थे,

वही एक दिन

हमारे खिलाफ़ सबसे बड़ा सबूत बनेगा।

 

उस दिन

कोई अदालत नहीं होगी,

कोई गवाह नहीं होगा,

कोई वकील नहीं होगा।

 

सिर्फ़ हमारा अंतर्मन होगा

और उसके सामने

हम स्वयं खड़े होंगे।

 

वह पूछेगा 

 जब सच तुम्हारे सामने था,

तुम चुप क्यों रहे?

 जब किसी की आवाज़ दबाई जा रही थी,

तुमने अपनी आवाज़ क्यों बचा ली?

 

जब किसी के साथ अन्याय हो रहा था,

तुमने यह क्यों सोचा

कि यह तुम्हारा मामला नहीं है?

 और तब...

 हमारे पास

कोई उत्तर नहीं होगा।

 

आँखें नीची होंगी,

चेहरा झुका होगा,

शब्द गले में अटक जायेंगे,

और हम

फिर से मौन हो जायेंगे।

 

लेकिन इस बार

हमारा मौन

किसी डर की वजह से नहीं होगा।

 

इस बार

हमारे पास

शर्म के अलावा

कुछ नहीं होगा।

 

और शायद

उस दिन हमें समझ आयेगा—

 

दोषी सिर्फ़ वह नहीं

जिसने गलत किया था,

दोषी वह भी है

जिसने गलत होते देखा

और सही के पक्ष में

खड़ा होने से इंकार कर दिया।

 

क्योंकि इतिहास

सिर्फ़ यह नहीं पूछता

कि अपराध किसने किया था...

 

इतिहास यह भी पूछता है 

 “जब अपराध हो रहा था,

तब तुम कहाँ थे?”

 

और उस दिन

हम चाहकर भी

यह नहीं कह पायेंगे—

 

“हमें पता नहीं था।”

 

क्योंकि सच तो यह है—

 हम जानते थे।

हमने देखा था।

हमने सुना था।

बस...

हमने बोलना नहीं चुना था।

 और शायद

हमारा सबसे बड़ा दोष

यही था।

Friday, October 2, 2026

बैचैन मन

 

हालातों पर करीब से निगाह रख रहा हूँ,

जिधर देखूँ, उधर बेचैनी देख रहा हूँ,

भागते फिरते सबको इधर-उधर,

सबको कुछ न कुछ खोजता देख रहा हूँ।

 

कुछ तो छिपा हुआ है कहीं,

दौड़ का अजब दौर देख रहा हूँ,

बदहवास हुए हैं सारे लोग,

माथों पर गहरी शिकन देख रहा हूँ।

 

देख रहा हूँ अजीब-से मंजर,

संशय के बादल घिरे देख रहा हूँ,

न जाने कहाँ खो गई विश्वास की डोर,

हर नज़र में संदेह भरे देख रहा हूँ।

 

हर कोई अनजानी मंज़िल की ओर,

बिना जाने ही बढ़ता देख रहा हूँ,

किसी को समय से आगे भागते,

किसी को समय से लड़ते देख रहा हूँ।

 

हाथों में सबके साधन बहुत हैं,

फिर भी खाली मन देख रहा हूँ,

हँसी चेहरों पर सजी हुई है,

आँखों में छिपी नमी देख रहा हूँ।

 

रिश्ते भी अब सवालों में हैं,

हर बात को तौलते देख रहा हूँ,

अपने ही अपनों से बचते फिरते,

विश्वास को सिसकते देख रहा हूँ।

 

राजनीति का गिरता स्तर देख रहा हूँ ,

नेताओं को गिरगिट बनते देख रहा हूँ ,

पार्टियों के चक्कर में ,

भाई -भाई के बीच झगड़ा देख रहा हूँ। 

 

देख रहा हूँ इस दौर को,

उम्मीद को भी पलते देख रहा हूँ,

अँधेरा चाहे जितना गहरा हो,

दूर कहीं उजाला देख रहा हूँ।