Saturday, April 4, 2026

गड़बड़झाला

 

बहुत गड़बड़झाला चल रहा है दुनिया में,

ताकतवर कमजोर पर रौब झाड़ रहा है,

अमीर गरीब को धरती का बोझ बता रहा है,

नियमों का तमाशा हर कोई बना रहा है।

 

रिश्ते-नातों से सब कन्नी काट रहे हैं,

"प्राइवेसी" के नाम पर परिवार से कट रहे हैं,

रुपये-पैसे की अंधी दौड़ लगी है,

इंसान खुद को  बेचकर भी मुस्कुरा रहा है।

 

सच अब अखबारों में भी आधा छपता है,

झूठ हर स्क्रीन पे पूरा चमकता है,

ईमानदारी अब मूर्खता कहलाती है,

चालाकी का सिक्का हर जगह चलता है।

 

दोस्ती भी अब फायदे से तौली जाती है,

मोहब्बत शर्तों में खोली जाती है,

हर कोई खुद को भगवान समझ बैठा है,

और इंसानियत चुपचाप रोती जाती है।

 

भीड़ में हर चेहरा अकेला सा लगता है,

हर रिश्ता अब सौदे जैसा लगता है,

जो जितना ज्यादा दिखावा करता है,

वो उतना ही अंदर से खोखला लगता है।

 

पर सच ये भी है, सब कुछ खत्म नहीं,

हर दिल अब भी पत्थर नहीं,

अगर आईना खुद को दिखा सको,

तो ये गड़बड़झाला भी अटल नहीं।

Thursday, April 2, 2026

एक संदेश - बच्चों के नाम

आसमां तुम्हारा, ज़मीन तुम्हारी,

सागर तुम्हारा, ये जहाँ तुम्हारा,

सीमाओं में खुद को मत बाँधो,

हर दिशा में फैला है उजियारा।

 

सपनों को ऊँची उड़ान दो,

पंखों में हौसलों की आग भरो,

जहाँ तक जाती है नज़र तुम्हारी,

उससे भी आगे कदम धरो।

 

आज में कल के निर्माता बनो,

अपने समय के तुम शिल्पकार बनो,

हर चुनौती को अवसर समझो,

अपने जीवन के खुद आधार बनो।

 

ऊर्जा के तुम अटूट भंडार,

साहस का साकार रूप बनो,

ठोकरों से घबराना कैसा,

गिरकर फिर से मजबूत बनो।

 

तुम ही हो कल का उगता सूरज,

विश्वास का परचम ऊँचा करो,

अंधेरों को चीरती किरण बन,

हर दिल में उजाला भरो।

 

नौनीहालों, यूँ ही खिलते रहो,

मासूमियत का मान बनो,

माँ-बाप की आँखों का सपना,

उनकी सबसे बड़ी पहचान बनो।