Wednesday, October 7, 2026

ज़िन्दगी विद्यालय

 

मैं ताउम्र

ज़िंदगी के विद्यालय का
एक छात्र ही रहूँगा,
रोज़ एक नया पाठ पढ़ूँगा,
पुराने पाठ दोहराऊँगा,
और फिर भी
किसी न किसी परीक्षा में
अनुत्तीर्ण होता रहूँगा।

इस विद्यालय में
उत्तीर्ण होना सरल नहीं है,
यहाँ प्रश्नपत्र
परीक्षा से पहले नहीं मिलता,
और उत्तर
अक्सर परीक्षा के बाद समझ आता है।

यहाँ
ठोकरें शिक्षक हैं,
अनुभव पाठ्यपुस्तक,
समय प्रधानाचार्य
और परिस्थितियाँ
सबसे कठिन परीक्षक।

कुछ पाठ
दूसरों की गलतियों से सीखेंगे,
कुछ अपनी गलतियों से,
और कुछ ऐसे होंगे
जिनकी कीमत
पूरी उम्र चुकानी पड़ेगी।

कभी रिश्ते पढ़ेंगे,
कभी रिश्ते खोकर समझेंगे,
कभी सफलता पर इतराएँगे,
कभी असफलता से टूटेंगे,
और फिर उसी टूटन से
खुद को जोड़ना सीखेंगे।

इस विद्यालय की सबसे बड़ी विडंबना है,
यहाँ अंतिम परीक्षा
तब होती है,
जब विद्यार्थी
परीक्षा देने के योग्य ही नहीं रहता।

इसलिए
अब उत्तीर्ण होने की चाह नहीं,
बस इतना प्रयास है,
कल का मैं
आज से थोड़ा बेहतर हो,
कुछ कम अहंकारी,
कुछ अधिक समझदार,
और थोड़ा अधिक इंसान हो।

क्योंकि
ज़िंदगी के इस विद्यालय में
डिग्री किसी को नहीं मिलती,
सिर्फ अनुभव मिलता है,
और अंत में
वही हमारी
सबसे बड़ी योग्यता बनता है।

Tuesday, October 6, 2026

दोष

 

 हमारा दोष गिना जायेगा,

उस दिन जिस दिन हिसाब होगा।

दोषियों में हमें भी गिना जायेगा,

क्यूँकि हमने सब देखते हुए आँखें बंद की थीं,

सब कुछ सुनते हुए भी चुप्पी साधी थी।

 

हम जानते हुए भी अनजान रहे,

सच सामने था,

फिर भी उससे नज़रें चुराते रहे।

अन्याय हमारे सामने होता रहा,

हम देखते रहे,

सुनते रहे,

और भागीदार बने रहे।

 

तो फिर

दोषी ठहराने का उनका हक़

हम कैसे छीन सकते हैं?

 

उस दिन शायद

हमारे पास कहने को बहुत कुछ होगा

डर था,

मजबूरी थी,

हालात ठीक नहीं थे,

हम अकेले क्या कर लेते...

 

लेकिन क्या सचमुच

हम इतने मजबूर थे?

 

या फिर

हमने अपनी सुविधा को

सच से बड़ा मान लिया था?

 

हमने सोचा

आवाज़ उठायेंगे तो

मुसीबत हमारे दरवाज़े तक आयेगी,

इसलिए चुप रहे।

 

हमने सोचा

कोई और बोलेगा,

इसलिए चुप रहे।

 

हमने सोचा

हमारा क्या लेना-देना?

और इसी सोच में

किसी और का सब कुछ लुटता रहा।

 

हम भूल गये थे

अन्याय सिर्फ़ करने वाला नहीं करता,

कभी-कभी

देखने वाला भी उसका हिस्सा बन जाता है।

 

क्योंकि अपराध करने के लिए

हाथ उठाना ही ज़रूरी नहीं,

कभी-कभी

सही समय पर हाथ न उठाना भी

एक अपराध होता है।

 

और मौन,

जिसे हम अपनी सुरक्षा समझ रहे थे,

वही एक दिन

हमारे खिलाफ़ सबसे बड़ा सबूत बनेगा।

 

उस दिन

कोई अदालत नहीं होगी,

कोई गवाह नहीं होगा,

कोई वकील नहीं होगा।

 

सिर्फ़ हमारा अंतर्मन होगा

और उसके सामने

हम स्वयं खड़े होंगे।

 

वह पूछेगा 

 जब सच तुम्हारे सामने था,

तुम चुप क्यों रहे?

 जब किसी की आवाज़ दबाई जा रही थी,

तुमने अपनी आवाज़ क्यों बचा ली?

 

जब किसी के साथ अन्याय हो रहा था,

तुमने यह क्यों सोचा

कि यह तुम्हारा मामला नहीं है?

 और तब...

 हमारे पास

कोई उत्तर नहीं होगा।

 

आँखें नीची होंगी,

चेहरा झुका होगा,

शब्द गले में अटक जायेंगे,

और हम

फिर से मौन हो जायेंगे।

 

लेकिन इस बार

हमारा मौन

किसी डर की वजह से नहीं होगा।

 

इस बार

हमारे पास

शर्म के अलावा

कुछ नहीं होगा।

 

और शायद

उस दिन हमें समझ आयेगा—

 

दोषी सिर्फ़ वह नहीं

जिसने गलत किया था,

दोषी वह भी है

जिसने गलत होते देखा

और सही के पक्ष में

खड़ा होने से इंकार कर दिया।

 

क्योंकि इतिहास

सिर्फ़ यह नहीं पूछता

कि अपराध किसने किया था...

 

इतिहास यह भी पूछता है 

 “जब अपराध हो रहा था,

तब तुम कहाँ थे?”

 

और उस दिन

हम चाहकर भी

यह नहीं कह पायेंगे—

 

“हमें पता नहीं था।”

 

क्योंकि सच तो यह है—

 हम जानते थे।

हमने देखा था।

हमने सुना था।

बस...

हमने बोलना नहीं चुना था।

 और शायद

हमारा सबसे बड़ा दोष

यही था।