काश की दुनियाँ ऐसी होती,
हर दहलीज में खुशियां होती,
मांगते सब एक दूसरे के लिये दुआएँ,
यही दुनियाँ क्या स्वर्ग नहीं होती।
काश की शब्द सही इस्तेमाल होते,
नश्तर बन किसी सीने में न चुभते,
मीठे बोलों से सजती ये दुनिया,
शायद महाभारत भी न होती।
काश की मस्तिष्क सृजन ही करता,
विध्वंस की कल्पना भी न होती,
अपनी सरहदों तक सीमित रहते,
फिर कोई जंग भी नहीं होती।
काश कि दिलों में प्रेम ही बसता,
नफरत की कोई जगह न होती,
हाथ बढ़ते सहारा देने को,
किसी की आँख कभी नम न होती।
काश कि इंसान इंसान रहता,
स्वार्थ की कोई दीवार न होती,
दर्द समझ लेते सब एक-दूजे का,
तो जिंदगी इतनी लाचार न होती।
काश कि धरती मुस्कुराती रहती,
हर ओर हरियाली की छाँव होती,
लोभ की आग न जलती मन में,
तो यह दुनिया सच में स्वर्ग सी होती।