पहाड़ों से मैदान
,
वो मैदान से हो गए
,
सारे बिखर से गये
,
थम गए , खो गए ,
जैसे पहाड़ों की नदी
,
खो देती है अपनी आवाज
,
अपनी गति ,
अपना बहाव ,
मैदान उसके सपनों
से ,
बहुत विपरीत होता
है ,
वो सामंजस्य बिठाने
की कोशिश करती है ,
मगर फिर थक हार कर
,
अपनी नियति समझ समझौता
कर लेती है ,
उसने हुलार को आसान
समझा ,
उकाव को कठिन ,
और फिर उसके पास ,
वापस लौटने का भी
कोई विकल्प नहीं होता,
गर होता तो क्या वो
,
उकाव चढ़ने का साहस
कर पाती ?
कुमाउँनी शब्द
उकाव : चढ़ाई
हुलार : उतराई व ढलान