किसी ने कहा—
खूब बारिश हुई,
झमाझम हुई,
इतनी हुई
कि सब पानी-पानी हो गया।
जब पूछा—
कहाँ हुई?
उसने कहा—
समंदर में।
किसी ने पूछा—
कितना विकास हुआ?
बहुत हुआ,
हर तरफ़ हुआ,
चारों ओर हुआ।
उसने पूछा—
कहाँ हुआ?
देखो ज़रा,
नेताओं और चमचों के
बड़े-बड़े घरों में हुआ।
किसी ने पूछा—
जनता को क्या मिला?
जनता को तो देना है—
वोट,
टैक्स,
और अपनी चुप्पी।
बारिश हुई—
समंदर भर गया,
विकास हुआ—
महल भर गए,
और जनता?
वह आज भी
बादलों को देख रही है-
इस उम्मीद में
कि शायद अगली बारिश
उसके घर की छत पर होगी।
लेकिन बारिश की बूँदें भी
शायद रास्ता जानती हैं-
समंदर का।

