Tuesday, June 30, 2026

सर्वश्रेष्ठ कविता

 

वह एक कविता लिखना चाहती थी,

एक सर्वश्रेष्ठ कविता।

 

कब से...

 

बचपन में भी उसने सोचा,

कलम भी उठाई,

कुछ सपने लिखे

खुले आसमान के,

नीले समंदर के,

आज़ाद हवा के।

 

फिर थोड़ी बड़ी हुई,

तो वह फाड़ दी।

 

फिर उसने कलम उठाई,

जब वह ब्याह कर

एक अनजान से घर में गई।

 

अब उसने लिखा

प्यार का सपना,

सपनों का घर।

 

और छुपा दी वह कविता।

 

फिर हाथ लगी वह कविता उसके।

पढ़ी उसने दो-चार बार जी भरकर,

फिर तोड़-मरोड़कर

डाल दी रद्दी के टोकरे में।

 

सालों बाद उसको फिर फुर्सत मिली,

जब वह फिर से तनहा थी।

 

सोचा उसने

आज लिखती हूँ वह कविता,

जिसे वह लिखना चाहती थी उम्र भर।

 

अब उसके पास

शब्द भी थे,

अनुभव भी था,

भाव भी थे।

 

लेकिन चार पंक्तियों से

आगे बढ़ पाई।

 

लिखना बहुत कुछ चाह रही थी,

मगर शायद लिखने में

वो पल ढूँढ़ रही थी

जो उसके अपने थे।

 

वह तो वही लिखना चाह रही थी,

मगर जाने कुरेदने पर भी

उसको वे नहीं मिल रहे थे।

 

लगता है,

वह कविता अधूरी ही रह जाएगी

वह कविता

जो सर्वश्रेष्ठ हो सकती थी।

 

लेकिन चार पंक्तियों से

आगे क्यों नहीं बढ़ पा रही थी?

 

और वह

कलम हाथ में पकड़े

शून्य में जाने क्या झाँक रही थी।

 

उसने बस अभी यह लिखा था

 

खुले आसमान की वो आज़ाद नन्ही-सी परी,

समेटना चाहती थी समंदर को अपने आँचल में,

हवाओं को अपने जुड़े में गूँथकर,

फूलों-सा महकना और चिड़ियों-सा उड़ना चाहती थी।

 

फिर...

 

कलम रुक गई।

 

शायद इसलिए नहीं

कि शब्द खत्म हो गए थे,

 

बल्कि इसलिए

कि उसके सपने

सबकी ज़िम्मेदारियाँ निभाते-निभाते

धीरे-धीरे

उसकी यादों से मिट गए थे।

 

उसे याद ही नहीं रहा

कि वह क्या बनना चाहती थी।

 

उसे याद रहे

तो बस रिश्ते,

कर्तव्य,

समझौते,

और दूसरों के लिए जिए हुए दिन।

 

अपनी कहानी का

सबसे सुंदर अध्याय

वह लिख ही सकी,

 

क्योंकि उसे जीने की

फुर्सत ही कहाँ मिली।

 

लोग कहते रहे

वह कविता पूरी नहीं हुई।

 

पर सच तो यह था,

 

वह कविता नहीं,

एक स्त्री अधूरी रह गई।

 

और शायद

दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कविताएँ

लिखी ही नहीं जातीं,

 

वे चुपचाप

किसी स्त्री के भीतर

पूरी उम्र

जी ली जाती हैं।

Monday, June 29, 2026

मैं कौन हूँ?

 

बस खुद को खोजना बाकी है,

और तो सब स्मार्टफ़ोन पर उपलब्ध है।

ज्ञान तो दसों दिशाओं से बह रहा है,

बस अंतर्मन को टटोलना बाकी है॥

 

सूचनाओं का शोर बहुत है,

पर मन अब भी मौन खड़ा है।

उत्तर तो हर प्रश्न के मिल जाते हैं,

बस "मैं कौन हूँ?" अनसुलझा पड़ा है॥

 

दुनिया को जीतने निकले हैं सब,

अपने ही मन से हार रहे हैं।

रिश्तों की भीड़ में मुस्कुराते चेहरे,

भीतर से जाने क्यों खाली हैं॥

 

ऊँची-ऊँची इमारतें गढ़ लीं हमने,

पर चरित्र की नींव हिलती जाती है।

सुविधाओं के इस अथाह समंदर में,

सुकून की बूँद तरसती है॥

 

दर्पण चेहरा रोज़ दिखाता है,

मन का आईना धुंधला रहता है।

धूल ज़रा-सी अहंकार की हट जाए,

तो ईश्वर भी भीतर दिखता है॥

 

जिस दिन ख़ुद से मिल बैठोगे,

हर उलझन का अर्थ बदल जाएगा।

जिसे तुम बाहर खोज रहे थे बरसों से,

वो भीतर ही मुस्कुराता मिल जाएगा॥