Tuesday, June 9, 2026

ए आई और हम

 कुछ ऐसा लिखो आनन्द अब , 

जो ए आई भी न लिख पाये , 

कुछ ऐसे सवाल बूझो , 

जो गूगल के पास भी न हो , 

नया कुछ ही अंतर पैदा करेगा , 

ए आई और तुम्हारी लेखनी में , 

अभी भी बहुत उम्मीद बची है , 

ए आई वही लिखेगा , 

जो अब तक लिखा जा चुका है , 

गूगल अब भी उन्ही प्रश्नों का उत्तर देगा , 

जो हल किये जा चुके है कभी , 

नया लिखने के लिये अभी भी बहुत है , 

और हजारों सवाल अब भी अनुत्तरित है , 

और यही अभी की "उम्मीद " है , 

ये उम्मीद और सम्भावना बहुत बड़ी है, 

इंसानो की बुद्धि और रचनात्मकता की , 

अभी तक तो कोई सीमा नहीं हैं , 

मजे की बात तो ये है " आनन्द " 

ए आई और गूगल सब , 

उसी करामाती ढाई सौ ग्राम के  , 

मस्तिष्क की बानगी भर है, 

ए आई अभी एक जमा एक को दो ही कहेगा , 

एक जमा एक को ग्यारह करने में अभी बहुत देर हैं।  

Saturday, June 6, 2026

उकाव -हुलार

 

 जो सपने लेकर उतरा था

पहाड़ों से मैदान ,

वो मैदान से हो गए ,

सारे बिखर से गये ,

थम गए , खो गए ,

जैसे पहाड़ों की नदी ,

खो देती है अपनी आवाज ,

अपनी गति ,

अपना बहाव ,

मैदान उसके सपनों से ,

बहुत विपरीत होता है ,

वो सामंजस्य बिठाने की कोशिश करती है ,

मगर फिर थक हार कर ,

अपनी नियति समझ समझौता कर लेती है ,

उसने हुलार को आसान समझा ,

उकाव को कठिन ,

और फिर  उसके पास ,

वापस लौटने का भी कोई विकल्प नहीं होता,

गर होता तो क्या वो ,

उकाव चढ़ने का साहस कर पाती ?


कुमाउँनी शब्द 

उकाव : चढ़ाई 

हुलार : उतराई व ढलान 

Tuesday, June 2, 2026

चिंतन

 


चिंता नहीं ,चिंतन होना चाहिए ,

भविष्य हमें कैसे चाहिए ,

दुनिया जिन हालातों से गुजर रही है ,

इस बात पर मंथन होना चाहिये। 

 

जिस रफ़्तार से बदल रही दुनिया ,

पुरानी परिपाटियाँ ध्वस्त हो रही ,

नये परिपेक्ष्य में कैसी हो दुनियाँ ,

इस बात पर मंथन होना चाहिये। 

 

जो पहले कल्पना था , अब यथार्थ है ,

मानव स्वभाव लेकिन  बदला नहीं है ,

लग रहे है उसके हाथ अस्त्र -शस्त्र नए ,

उपयोगों पर उनके मंथन चाहिये। 

 

रिश्ते नातों की नींव भी दरक रही ,

सबको समाज बस नाम के लिए चाहिये ,

ऑनलाइन समाज की नयी दुनिया बस चुकी ,

उस समाज की नींव पर चिंतन चाहिये।

Tuesday, May 19, 2026

शहर

 

किससे मिले इस शहर में ,

हर कोई तो यहाँ व्यस्त है ,

किससे पूछे हाल चाल शहर में ,

यहाँ हर शख्श  परेशान सा है।

 

न जाने कैसी आबो हवा है यहाँ ,

जिस से मिलो, उसकी हालत ख़राब है ,

फुर्सत यहाँ सलीके से खाने तक की नहीं ,

सबको यहाँ जल्दी की आदत क्यों है।

 

हवा तक खरीदी जा रही है यहाँ ,

हर नुक्कड़ पर एक अस्पताल है ,

नुमाइशो के बाजार पर सबकी नजर है,

टटोलते है जेब जब , वह खाली है।

 

इस शहर में रिश्तों की भीड़ बहुत,

पर दिल से दिल का मिलना मुश्किल है,

चेहरों पर मुस्कानें चिपकी हुई हैं,

अंदर हर इंसान थोड़ा घायल है।

 

सड़कों पर रौशनियाँ जगमग हैं,

पर आँखों में अंधेरा पलता है,

ऊँची इमारत छूती हैं बादल को,

पर आदमी भीतर से बिखरता है।

Tuesday, May 5, 2026

मर्ज़ी

 

जो है , सब ईश्वर की मर्ज़ी ,

जैसा है , सब ईश्वर की मर्ज़ी ,

जो होगा ,वो ईश्वर की मर्ज़ी ,

चलते रहना ही बस मेरी मर्ज़ी।

 

ख़ुशी भी उसकी मर्ज़ी ,

दर्द भी उसकी मर्ज़ी ,

हार -जीत भी उसकी मर्ज़ी ,

चलते रहना , बस मेरी मर्ज़ी।

 

साँसे ,उसकी मर्ज़ी ,

हवायें , उसकी मर्ज़ी ,

दिन रात ,उसकी मर्ज़ी ,

बस चलते रहना , मेरी मर्ज़ी।

Wednesday, April 22, 2026

सब्र का फल

 

रात कितनी काली क्यों हो,

एक जुगनू भ्रम तोड़ देता है,

उदासी कितनी भले ही हो,

एक ख़ुशी का पल सब भुला देता है।

 

लहरें कितनी तेज क्यों हो,

एक पत्थर उसे रोक ही देता है,

तूफानों को अक्सर एक,

नन्हा पौधा हँसकर सह लेता है।

 

हार तो बस एक सबक है,

जीतने की तैयारी का एक कदम है,

मेहनत एक दिन रंग लायेगी ही,

सब्र का फल मीठा होता है।

 

जूनून कुछ पाने का सच्चा है,

कायनात भी साथ देती है ,

विश्वास हो खुद पर तो,

सफलता तुम्हारे क़दमों में होती है

Monday, April 13, 2026

समयधारा

हम समयधारा के,
अत्यंत सूक्ष्म अंश हैं,
जैसे इस विराट ब्रह्मांड में
अनगिनत आकाशगंगाएँ,
और उनमें बिखरे अगणित तारे
हम शायद उनसे भी न्यून हैं।

फिर भी, जब हम
इस बहती समयधारा में होते हैं,
तब हमारा अस्तित्व
चमकदार भी होता है,
और वजनी भी।

समय का आदि है,
कोई निश्चित अंत,
पर यह जो क्षण है,
जिसमें हम, समय के साथ हैं,
यही हमारा सत्य है।

इसी क्षण में,
अपने कर्मों के वेग से,
हम इस धारा को
गर्वित और प्रशस्त कर सकते हैं,
और इसी प्रवाह में
अपने नाम की छाप
अमर कर सकते हैं।


Friday, April 10, 2026

रिश्ते

आजकल रिश्ते धुंधले आईनों जैसे हैं,

चेहरे तो दिखते हैं, पर साफ़ नहीं हैं,

हर बात में एक “पर” छुपा होता है,

हर खामोशी अब लापरवाह नहीं हैं ।


बातें होती हैं, पर दिल नहीं मिलता,

हँसी भी अब थोड़ी सधी-सधी है,

लोग साथ तो चलते हैं अक्सर,

पर दूरी कहीं अंदर खड़ी है।


ऑनलाइन दिखती है अपनेपन की दुनिया,

ऑफ़लाइन सब उलझा-सा रहता है,

“टाइपिंग…” में जो ठहराव है,

वो असल जज़्बातों की कहानी कहता है।


अब रिश्तों में हिसाब भी जुड़ गया है,

किसने कितना दिया, कौन कम रहा,

प्यार की जगह तौलने लगे हैं लोग,

कौन ज़्यादा था, कौन कम रहा।


अहं के छोटे-छोटे कण से,

मन के आईने धुंधले हो जाते हैं,

सही-गलत की भीड़ में खोकर,

अपने ही अपने से दूर हो जाते हैं।


विश्वास की डोर पतली इतनी  ,

शक की हवा से टूट जाती है,

एक छोटी-सी गलतफ़हमी भी,

सालों की नज़दीकी लूट ले जाती है।


फिर भी कहीं एक उम्मीद बची है,

कुछ रिश्ते अब भी सच्चे हैं,

जहाँ शब्द कम और एहसास गहरे,

जहाँ “हम” अब भी “मैं” से अच्छे हैं।

Wednesday, April 8, 2026

आहिस्ता


 आहिस्ता -आहिस्ता चल ज़िन्दगी ,

हर मंजर का लुत्फ़ लेने दे,

बस एक बार मिली है ज़िंदगानी ,

जरा जी भर कर जी लेने दे।

 

थोड़ी धूप, थोड़ी छाँव मिले,

हर रंग को दिल में बसने दे,

कभी हँसी की गूंज उठे,

कभी आँसू भी बहने दे।

 

ना भाग इस कदर कि खुद से ही दूर हो जाए,

इन लम्हों को थोड़ा ठहरने दे,

जो छूट गए हैं रास्ते में,

उन ख्वाबों को फिर से पलने दे।

 

आहिस्ता-आहिस्ता चल ज़िन्दगी,

हर लम्हे को गीत बनने दे,

बस एक बार मिली है ज़िंदगानी,

हर साँस का एहसास होने दे।