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Monday, March 16, 2026

स्वर्ग

काश की दुनियाँ ऐसी होती,
हर दहलीज में खुशियां होती,
मांगते सब एक दूसरे के लिये दुआएँ,
यही दुनियाँ क्या स्वर्ग नहीं होती।

काश की शब्द सही इस्तेमाल होते,
नश्तर बन किसी सीने में चुभते,
मीठे बोलों से सजती ये दुनिया,
शायद महाभारत भी होती।

काश की मस्तिष्क सृजन ही करता,
विध्वंस की कल्पना भी होती,
अपनी सरहदों तक सीमित रहते,
फिर कोई जंग भी नहीं होती।

काश कि दिलों में प्रेम ही बसता,
नफरत की कोई जगह होती,
हाथ बढ़ते सहारा देने को,
किसी की आँख कभी नम होती।

काश कि इंसान इंसान रहता,
स्वार्थ की कोई दीवार होती,
दर्द समझ लेते सब एक-दूजे का,
तो जिंदगी इतनी लाचार होती।

काश कि धरती मुस्कुराती रहती,
हर ओर हरियाली की छाँव होती,
लोभ की आग जलती मन में,
तो यह दुनिया सच में स्वर्ग सी होती।


Monday, February 3, 2025

जीवन मूल्य

 

गुजर रहे है हम उस दौर से ,

सब कुछ धीरे -धीरे बदल रहा ,

नए मानक स्थापित हो रहे है,

पीछे बहुत कुछ छूट रहा।

 

पीछे जो छूट रहा है ,

उसमे कुछ सँभालने लायक भी है ,

मगर दौड़ इतनी भयंकर ,

सँभालने का वक्त किसको मिल रहा।

 

परिवार दरक रहा ,विश्वास हिल रहा ,

धैर्य हिचकोलों में फँसा हुआ ,

आस्थाओं पर प्रश्नचिन्ह है,

ये कौन दिशा और दशा तय कर रहा।

 

प्रेम -स्वार्थ की बलि चढ़ रहा ,

अहं सिर चढ़ बोल रहा ,

बेवजह चिंताएं शरीर नाश कर रही ,

जो है हाथ में , वो भी खो रहा।

 

बेशक नए मूल्य गढ़ने चाहिये ,

परिवर्तन समय की दरकार भी है ,

मगर जिन मूल्यों पर खड़ा है जीवन , 

उनको सहेजना भी जरुरी है।

Friday, September 30, 2022

उस पार

 

नहीं , वो मर नहीं सकता ,

फफक -फफक वो रो पड़ी ,

गयी भी नहीं देखने ,

अंतिम बार उसका चेहरा ,

बंधनो में जकड़ी थी ,

याद था उसको वादा ,

जो वर्षों पहले उसने ,

किया था एक दिन ,

उसने भी दोहराया था ,

बीत गए थे जाने कितने वसंत ,

वादा मगर हमेशा ताजा रहा ,

उम्मीद पर अनगिनत दिन गुजर गए ,

साँझ हो गयी जीवन की ,

मगर वादा बूढ़ा हुआ ,

आज ऐसी अनहोनी कैसे हो गयी ,

वो कैसे जा सकता था ?

अब तो मिलने के लिए ,

शायद उसको भी ,

उस पार जाना ही होगा,

बस "धड़ाम " की हल्की आवाज हुई ,

उस पार शायद मिलन ,

जरूर हुआ होगा,

इस पार तो उनका प्रेम ,

बेड़ियों में ही जकड़ा रहा। 

Wednesday, September 11, 2019

प्रेम की सीढ़ी



आईने में खुद को सज धज कर निहारती ,
उसकी आँखों में जैसे अजब सा सुकून था ,
झील सी आँखों के ऊपर उसने ,
काजल से जैसे तटबंध बनाये थे ,
गेसुओं को करीने से पीछे बाँध कर ,
महक लिए कुछ फूल गुँथे थे ,
गालो पर हल्का हल्का ,
गुलाबी मस्कारा लगाया था ,
खुद से आईने के सामने ,
शर्मा रही थी  ,
बड़े दिनों से सजने की ,
तमन्ना को जिये जा रही थी ,
किसी दूसरे से प्रेम करने से पहले ,
खुद से प्रेम करना सीख रही थी । 

उसे आज किसी और के लिए नहीं ,
खुद के लिए सज रही थी ,
बदल बदल कर कपडे वो ,
हर रंग के साथ निखर रही थी ,
खुद से अपने चेहरे पर ,
एक काला टीका भी लगा लिया ,
नजर न लग जाए खुद की ,
चेहरा सुर्ख गुलाबी  हो गया।  
खुद से प्रेम हो रहा था उसे ,
आज वो जैसे पूर्ण हो रही थी,
प्रेम की सीढ़ी जैसे ,
आज वह चढ़ रही थी ।

फोटो सौजन्य और आभार - गूगल