चिंता नहीं ,चिंतन
होना चाहिए ,
भविष्य हमें कैसे
चाहिए ,
दुनिया जिन हालातों
से गुजर रही है ,
इस बात पर मंथन होना
चाहिये।
जिस रफ़्तार से बदल
रही दुनिया ,
पुरानी परिपाटियाँ
ध्वस्त हो रही ,
नये परिपेक्ष्य में
कैसी हो दुनियाँ ,
इस बात पर मंथन होना
चाहिये।
जो पहले कल्पना था
, अब यथार्थ है ,
मानव स्वभाव लेकिन बदला नहीं है ,
लग रहे है उसके हाथ
अस्त्र -शस्त्र नए ,
उपयोगों पर उनके मंथन
चाहिये।
रिश्ते नातों की नींव
भी दरक रही ,
सबको समाज बस नाम
के लिए चाहिये ,
ऑनलाइन समाज की नयी
दुनिया बस चुकी ,
उस समाज की नींव पर
चिंतन चाहिये।