अंतर्मन बस खुद को खोजना बाकी है,
और तो सब स्मार्टफ़ोन पर उपलब्ध है।
ज्ञान तो दसों दिशाओं से बह रहा है,
बस अंतर्मन को टटोलना बाकी है॥
सूचनाओं का शोर बहुत है,
पर मन अब भी मौन खड़ा है।
उत्तर तो हर प्रश्न के मिल जाते हैं,
बस "मैं कौन हूँ?" अनसुलझा पड़ा है॥
दुनिया को जीतने निकले हैं सब,
अपने ही मन से हार रहे हैं।
रिश्तों की भीड़ में मुस्कुराते चेहरे,
भीतर से जाने क्यों खाली हैं॥
ऊँची-ऊँची इमारतें गढ़ लीं हमने,
पर चरित्र की नींव हिलती जाती है।
सुविधाओं के इस अथाह समंदर में,
सुकून की बूँद तरसती है॥
दर्पण चेहरा रोज़ दिखाता है,
मन का आईना धुंधला रहता है।
धूल ज़रा-सी अहंकार की हट जाए,
तो ईश्वर भी भीतर दिखता है॥
जिस दिन ख़ुद से मिल बैठोगे,
हर उलझन का अर्थ बदल जाएगा।
जिसे तुम बाहर खोज रहे थे बरसों से,
वो भीतर ही मुस्कुराता मिल जाएगा॥
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