हमें सुकून चाहिये ही नहीं ,
ज्यादा सुकून से हमें बेचैनी हो जाती है ,
हमारा दिमाग फड़फड़ाने लगता है ,
उसको खुराक की कमी हो जाती है ,
फिर उसे तलाश होने लगती है ,
उधेड़बुन की , तलाशने लगता है ,
वो मसले , जिनसे सुकून छीनने लगता है ,
मसला कुछ भी हो सकता है ,
व्यक्तिगत या सामाजिक ,
देश -दुनिया की या समाज की ,
वो अपनी फितरत छोड़ नहीं सकता ,
क्यूंकि ज्यादा सुकून उसको ,
हजम ही नहीं हो सकता ,
उसे दौड़ते रहना पसंद है ,
और यही दौड़ तो उसे ,
ज़िंदा रखती है अंत तक ,
जब तक साँस की आखिरी डोर ,
उसे थाम न
ले।
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