Sunday, June 14, 2026

फितरत

 


हमें सुकून चाहिये ही नहीं ,

ज्यादा सुकून से हमें बेचैनी हो जाती है ,

हमारा दिमाग फड़फड़ाने लगता है ,

उसको खुराक की कमी हो जाती है ,

फिर उसे तलाश होने लगती है ,

उधेड़बुन की , तलाशने लगता है ,

वो मसले , जिनसे सुकून छीनने लगता है ,

मसला कुछ भी हो सकता है ,

व्यक्तिगत या सामाजिक ,

देश -दुनिया की या समाज की ,

वो अपनी फितरत छोड़ नहीं सकता ,

क्यूंकि ज्यादा सुकून उसको ,

हजम ही नहीं हो सकता ,

उसे दौड़ते रहना पसंद है ,

और यही दौड़ तो उसे ,

ज़िंदा रखती है अंत तक ,

जब तक साँस की आखिरी डोर ,

उसे थाम   ले। 

No comments:

Post a Comment