Saturday, June 6, 2026

उकाव -हुलार

 

 जो सपने लेकर उतरा था

पहाड़ों से मैदान ,

वो मैदान से हो गए ,

सारे बिखर से गये ,

थम गए , खो गए ,

जैसे पहाड़ों की नदी ,

खो देती है अपनी आवाज ,

अपनी गति ,

अपना बहाव ,

मैदान उसके सपनों से ,

बहुत विपरीत होता है ,

वो सामंजस्य बिठाने की कोशिश करती है ,

मगर फिर थक हार कर ,

अपनी नियति समझ समझौता कर लेती है ,

उसने हुलार को आसान समझा ,

उकाव को कठिन ,

और फिर  उसके पास ,

वापस लौटने का भी कोई विकल्प नहीं होता,

गर होता तो क्या वो ,

उकाव चढ़ने का साहस कर पाती ?


कुमाउँनी शब्द 

उकाव : चढ़ाई 

हुलार : उतराई व ढलान 

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