मन के अंतरतल में यादों के दरख़्त गहरे,
उम्मीदों के सफ़र में यायावर चल धीरे-धीरे,
वक़्त एक बँधा हुआ है तेरे संग,
मौज से ख़र्च कर, मुस्करा हौले-हौले।
धूप भी तेरी है, छाँव भी तेरी,
राह की हर ठोकर एक सीख है गहरी,
हर मोड़ पर ठहर, ज़रा ख़ुद से भी मिल,
ज़िंदगी खुलती है हौले-हौले।
जो बिछड़ गए, उन्हें दुआओँ में रहने दे,
जो मिल गए, उन्हें दिल में बसने दे,
हर रिश्ता मुकम्मल हो, ये ज़रूरी तो नहीं,
कुछ अहसास महकते हैं हौले-हौले।
ना मंज़िल की फ़िक्र में सफ़र खो देना,
ना कल की चिंता में आज रो देना,
जो पल हथेली पर आकर ठहर गया,
उसे जी भर जी ले हौले-हौले।
जब अंत में मुड़कर देखेगा यह कारवाँ,
न दौलत, न शोहरत करेगी बयाँ,
बस मुस्कानों की पूँजी साथ रहेगी ,
और मन कहेगा-खूब जिया हौले-हौले।