जिस रफ़्तार पर हम सवार हुए हैं,
वो रफ़्तार एक दिन हमें
औंधे मुँह गिरायेगी।
बड़ा सरल नियम है गति का,
संतुलन बनाये रखना बहुत ज़रूरी।
हर विकास की कीमत होती है,
कितनी होगी?
ये प्रकृति तय करेगी।
विरोधाभास यह है, "आनंद",
हमारे और प्रकृति की नहीं जमती।
हमने पहाड़ों को काट दिया,
नदियों को बाँध दिया,
जंगलों को उजाड़ दिया,
और फिर हम कहते हैं ,
प्रकृति हमारी मुट्ठी में है।
हमने आसमान छूने की चाह में
धरती को पीछे छोड़ दिया,
समंदर की गहराइयों में उतर गये,
चाँद पर घर बनाने कवायद शुरू कर दी,
पर अपने भीतर उतरना भूल गये।
शहर बढ़ते गये,
पेड़ घटते गये,
सड़कें चौड़ी होती गयीं,
रास्ते छोटे होते गये,
मकान ऊँचे होते गये,
आँगन छोटे होते गये।
रफ़्तार ने बहुत कुछ दिया,
मगर बहुत कुछ छीन भी लिया,
समय बचाने की कोशिश में
हमने जीना ही कम कर दिया।
अब हवा भी हिसाब माँगती है,
नदियाँ सवाल करती हैं,
पेड़ ठूँठ बन उदासी से ,
हमारी तरक्की देखते हैं,
और मौसम हर साल
अपना रंग बदलकर
हमें चेतावनी देता है।
शायद विकास बुरा नहीं है,
बुरी है उसकी दिशा,
बुरी है वो अंधी दौड़
जिसमें मंज़िल से ज्यादा
रफ़्तार मायने रखने लगे।
ज़रूरत है थोड़ा ठहरने की,
थोड़ा सोचने की,
धरती की धड़कन सुनने की,
क्योंकि ये धरती
सिर्फ हमारी नहीं है।
रफ़्तार रखो,
मगर संतुलन के साथ,
विकास करो,
मगर प्रकृति के साथ।
क्योंकि जिस दिन
प्रकृति ने अपनी रफ़्तार पकड़ ली,
उस दिन इंसान की
सारी रफ़्तार छोटी पड़ जायेगी।
और तब शायद
हम समझ पायेंगे ,
ज़िंदगी दौड़ने का नाम नहीं,
संतुलन के साथ
चलते रहने का नाम है।
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