Wednesday, August 5, 2026

मन के अंतरतल में

 

मन के अंतरतल में यादों के दरख़्त गहरे,

उम्मीदों के सफ़र में यायावर चल धीरे-धीरे,

वक़्त एक बँधा हुआ है तेरे संग,

मौज से ख़र्च कर, मुस्करा हौले-हौले।

 

धूप भी तेरी है, छाँव भी तेरी,

राह की हर ठोकर एक सीख है गहरी,

हर मोड़ पर ठहर, ज़रा ख़ुद से भी मिल,

ज़िंदगी खुलती है हौले-हौले।

 

जो बिछड़ गए, उन्हें दुआओँ में रहने दे,

जो मिल गए, उन्हें दिल में बसने दे,

हर रिश्ता मुकम्मल हो, ये ज़रूरी तो नहीं,

कुछ अहसास महकते हैं हौले-हौले।

 

ना मंज़िल की फ़िक्र में सफ़र खो देना,

ना कल की चिंता में आज रो देना,

जो पल हथेली पर आकर ठहर गया,

उसे जी भर जी ले हौले-हौले।

 

जब अंत में मुड़कर देखेगा यह कारवाँ,

दौलत, शोहरत करेगी बयाँ,

बस मुस्कानों की पूँजी साथ रहेगी ,

और मन कहेगा-खूब जिया हौले-हौले।

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