थका-हारा लौट आया, अपने किराये के द्वार,
कंधों पर दिनभर की थकान, सीने में वर्षों का भार।
पत्नी की आँखों में प्रश्न था, बच्चों के चेहरे उदास,
वह मुस्कुराकर कह गया—“कुछ नहीं”, छुपाकर मन की बात।
कितना अजीब है आदमी, दर्द भी उसका अपना नहीं,
रोना चाहता है मगर आँखों को रोने की इजाज़त नहीं।
कुछ सपने रास्तों में छूटे, कुछ रिश्ते हुए अनजान,
कुछ अपने केवल नाम के, कुछ रह गए यादों के मेहमान।
रोटी, किराया, बच्चों की पढ़ाई—जिम्मेदारियाँ तमाम,
अपने हिस्से की धूप छोड़कर, सबके लिए ढूँढ़ता रहा शाम।
जिस नौकरी पर कभी गर्व था, अब वही मजबूरी है,
गिरने से डरता है क्योंकि नीचे कोई बाँह नहीं, कोई दूरी नहीं।
रात ढले जब घर सोता है, वह खिड़की पर बैठा रहता है,
बीते हुए अपने दिनों से चुपचाप बातें करता रहता है।
आईना चेहरा दिखाता है, भीतर का दर्द नहीं,
आँखों की नमी पढ़ सके—ऐसा कोई अपना नहीं।
तकिये पर गिरा एक आँसू, बरसों की कहानी कह गया,
जिसे दुनिया मजबूत समझती थी, वह भीतर से कहीं बह गया।
टूटकर भी टूट नहीं सकता, रोकर भी रो नहीं सकता,
हारकर भी हार नहीं सकता—क्योंकि अपनों को खो नहीं सकता।
कभी मन करता है कह दे—“आज मुझे संभाल लो,
आज मुझे मजबूत मत समझो, बस थोड़ा-सा थाम लो।”
मगर फिर सुबह होती है, वह चेहरे पर मुस्कान रखता है,
और अपने ही टूटे मन को समझाकर फिर काम पर निकलता है।
जिसने पूरी उम्र सबको गिरने से बचाया,
उसे गिरने के लिए भी कोई कंधा न मिल पाया।
बस एक सवाल आज भी उसके भीतर चुपचाप जलता है—
“जब अपना ही मन भारी हो, तो कहें किससे मन की बात?”