Tuesday, September 8, 2026

मन की बात

थका-हारा पहुँचा

अपने किराये के द्वार,

कंधों पर दिनभर की थकान,

सीने में जाने कितने वर्षों का भार।


दरवाज़ा खोला तो

घर वैसा ही था,

बस आज उसे

अपना घर कुछ कम लगा।


पत्नी की आँखों में

एक अनकहा सवाल था,

वह पूछना चाहती थी—

“क्या हुआ?”

पर शायद उसे डर था

कि कहीं जवाब सुनकर

उसकी अपनी आँखें न छलक जाएँ।


बच्चे चुप थे,

अपने पिता के चेहरे को पढ़ रहे थे,

जैसे पहली बार समझ रहे हों

कि पिता भी थकते हैं,

पिता भी टूटते हैं,

बस बताते नहीं।


वह मुस्कुराया,

बच्चों के सिर पर हाथ रखा,

और हमेशा की तरह कहा—

“कुछ नहीं हुआ...”


कितना अजीब है न,

एक आदमी की जिंदगी में

सबसे ज्यादा बोला जाने वाला झूठ

अक्सर यही होता है—

“कुछ नहीं हुआ।”


जबकि भीतर

बहुत कुछ हो चुका होता है।


कुछ सपने मर चुके होते हैं,

कुछ उम्मीदें दम तोड़ चुकी होती हैं,

कुछ रिश्ते चुपचाप दफन हो चुके होते हैं,

और कुछ सवाल

उम्र भर के लिए अनुत्तरित रह जाते हैं।


मित्र थे कभी,

अब सिर्फ यादों में हैं।

रिश्तेदार थे कभी,

अब सिर्फ रिश्तेदारी में हैं।


समय ने सबको

अपने-अपने मतलब दे दिए,

और उसे

उसका अकेलापन।


अब कोई देर रात फोन नहीं करता,

कोई यह नहीं पूछता—

“बहुत चुप हो आज,

सब ठीक तो है?”


काम पर जाता है,

काम से लौटता है,

और घर की चारदीवारी में

अपने ही भीतर

एक और दीवार खड़ी कर लेता है।


उम्र अब

चेहरे पर नहीं,

काम की रफ्तार में दिखाई देती है।


आँखें पहले जैसी नहीं रहीं,

हाथों में पहले जैसी तेजी नहीं,

घुटनों में पहले जैसा दम नहीं,

और मन में

पहले जैसा उत्साह नहीं।


मैनेजर की आवाज़

अब रोज़ कुछ कहती है—


“आपकी परफॉर्मेंस पहले जैसी नहीं रही।”


वह सुनता है,

सिर झुका देता है।


कैसे समझाए उसे

कि परफॉर्मेंस सिर्फ हाथों से नहीं होती,

मन से भी होती है।


और उसका मन तो

कब का थक चुका है।


कभी इस नौकरी पर

उसे गर्व हुआ करता था,

आज वही नौकरी

उसके लिए सिर्फ एक रस्सी है

जिसे वह इसलिए पकड़े हुए है

क्योंकि नीचे

गिरने के बाद

पकड़ने वाला कोई नहीं।


रोटी कमानी है,

बच्चों की जरूरतें पूरी करनी हैं,

किराया देना है,

बिजली का बिल भरना है।


इसलिए शरीर चाहे कहे—

“अब नहीं...”


वह मन को समझाता है—

“अभी नहीं।”


अभी बच्चों की पढ़ाई बाकी है,

अभी बेटी की शादी बाकी है,

अभी घर के कुछ सपने बाकी हैं,

अभी पत्नी की कुछ इच्छाएँ बाकी हैं।


अपने लिए?


अपने लिए तो

उसने बहुत पहले

कुछ माँगना छोड़ दिया था।


कभी-कभी रात को

जब सब सो जाते हैं,

वह खिड़की के पास बैठता है।


बाहर शहर सो रहा होता है,

और उसके भीतर

एक पूरा शहर जाग रहा होता है।


बीते हुए दिनों का शहर,

छूटे हुए लोगों का शहर,

अधूरे सपनों का शहर,

और उन रास्तों का शहर

जहाँ कभी वह

बहुत दूर तक जाना चाहता था।


वह सोचता है—


“आखिर कहाँ गलती हुई?”


क्या जरूरत से ज्यादा

सबके लिए जीना गलती थी?


क्या हर रिश्ते को

दिल से निभाना गलती थी?


क्या अपने हिस्से की खुशियाँ

दूसरों में बाँट देना गलती थी?


या गलती सिर्फ इतनी थी

कि उसने कभी

अपने दर्द को

दर्द मानकर जिया ही नहीं?


वह उठता है,

आईने के सामने खड़ा होता है।


आईना वही चेहरा दिखाता है

जिसे दुनिया देखती है।


लेकिन उसे मालूम है—

आईना चेहरा दिखाता है,

थकान नहीं।


वह आँखें दिखाता है,

उनमें छिपी नमी नहीं।


वह झुर्रियाँ दिखाता है,

उन झुर्रियों के पीछे

दबी हुई कहानियाँ नहीं।


और शायद इसीलिए

आईने के सामने खड़ा आदमी

सबसे ज्यादा अकेला होता है।


क्योंकि वहाँ

उससे झूठ बोलने वाला

कोई दूसरा नहीं होता।


उस रात

तकिये पर सिर रखकर

वह बहुत देर तक छत देखता रहा।


फिर जाने कब

एक आँसू आँख के कोने से निकला,

गाल पर आया,

और तकिये में समा गया।


बस एक आँसू।


बाकी सारे आँसू

शायद उसने

बरसों पहले ही

पी लिए थे।


सुबह पत्नी ने पूछा—

“नींद आई?”


वह मुस्कुराया—


“हाँ...”


फिर वही झूठ।


दरवाज़ा खोला,

जूते पहने,

कंधे सीधे किए

और काम पर निकल गया।


क्योंकि जिंदगी

टूटे हुए लोगों को

आराम करने की मोहलत नहीं देती।


उसे चलते रहना था।


चाहे भीतर

कुछ भी न बचा हो।


और शायद यही

एक आदमी की सबसे बड़ी त्रासदी है—


वह टूटकर भी

टूट नहीं सकता,

रोकर भी

रो नहीं सकता,

हारकर भी

हार नहीं सकता।


क्योंकि उसके पीछे

एक परिवार खड़ा होता है।


इसलिए वह

हर सुबह मरता है थोड़ा-सा,

और हर सुबह

जी उठता है

अपनों के लिए।


बस एक सवाल

आज भी उसके भीतर जिंदा है—


जब वह खुद

किसी का सहारा बनते-बनते

सहारे को तरस गया,

तो वह अपना सिर

किसके कंधे पर रखे?


किससे कहे

कि वह खुश नहीं है?


किससे कहे

कि वह बहुत थक गया है?


किससे कहे

कि मजबूत दिखते-दिखते

वह भीतर से

बिल्कुल खाली हो चुका है?


किससे कहे

कि उसे भी कभी

किसी का हाथ चाहिए?


किससे कहे—


“आज मुझे संभाल लो,

आज मुझे मजबूत मत समझो...”


मगर कोई नहीं है।


शायद इसलिए

उसने बोलना छोड़ दिया।


अब उसकी खामोशी ही

उसकी सबसे लंबी कहानी है।


और उस कहानी का

सबसे दर्दनाक वाक्य—


“अपने तो बहुत मिले जिंदगी में,

पर अपना कोई नहीं मिला।”


फिर भी वह जी रहा है...


किसी उम्मीद से नहीं,

किसी खुशी के लिए नहीं,

बस इसलिए

कि कुछ लोग हैं

जिन्हें उसके होने की

अभी भी जरूरत है।


और शायद यही

जिंदगी का सबसे बड़ा व्यंग्य है—


जिस आदमी ने पूरी उम्र

दूसरों को गिरने से बचाया,

उसे गिरने के लिए भी

किसी कंधे का इंतज़ार करना पड़ा।


वह फिर मुस्कुराता है,

आँसू पोंछता है,

और खुद से कहता है—


चल...

अभी बहुत कुछ बाकी है।


फिर कदम बढ़ा देता है।


पीछे छूट जाता है

उसका कमरा,

उसका बिस्तर,

उसकी खामोशी

और उसकी अधूरी बात।


और मन के किसी कोने से

फिर वही आवाज़ आती है—


कहें किससे मन की बात...

जब सुनने वाला कोई नहीं।


शायद जिंदगी का सबसे बड़ा अकेलापन

अकेले रह जाना नहीं है,

बल्कि लोगों से घिरे होकर भी

अपने मन की बात

किसी एक इंसान से न कह पाना है।


और सबसे बड़ा दर्द यह नहीं

कि कोई हमारे साथ नहीं,

सबसे बड़ा दर्द यह है :

कि हम टूट रहे होते हैं

और दुनिया हमें

अब भी मजबूत समझ रही होती है।

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