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Saturday, June 20, 2026

आ जाया करो

 

कब से है इंतज़ार तुम्हारा,

कभी मिलने आ जाया करो ।

तन्हा-तन्हा सी है ज़िंदगी,

आकर कभी महफ़िल जमाया करो॥

 

मसरूफ़ियत से वाक़िफ़ हैं हम तुम्हारी,

सबका बोझ तुम उठाए हो।

लम्हा-लम्हा कट रही है ज़िंदगी,

कुछ पल हमारे लिए भी चुराया करो॥

 

शिकवा नहीं है कोई तुमसे,

बस दिल की बात सुना जाया करो।

राहों में बिछी हैं यादें तुम्हारी,

कभी उन राहों से गुज़र जाया करो॥

 

उम्र यूँ ही गुज़र जाएगी,

वक़्त फिर लौटकर आएगा।

जो पल हैं आज हमारे पास,

उन्हें साथ मिलकर बिताया करो॥

 

कब से है इंतज़ार तुम्हारा,

ये दिल आज भी पुकारता  है।

जब भी याद हमारी आए,

बस एक बार चले आया करो॥

Friday, April 10, 2026

रिश्ते

आजकल रिश्ते धुंधले आईनों जैसे हैं,

चेहरे तो दिखते हैं, पर साफ़ नहीं हैं,

हर बात में एक “पर” छुपा होता है,

हर खामोशी अब लापरवाह नहीं हैं ।


बातें होती हैं, पर दिल नहीं मिलता,

हँसी भी अब थोड़ी सधी-सधी है,

लोग साथ तो चलते हैं अक्सर,

पर दूरी कहीं अंदर खड़ी है।


ऑनलाइन दिखती है अपनेपन की दुनिया,

ऑफ़लाइन सब उलझा-सा रहता है,

“टाइपिंग…” में जो ठहराव है,

वो असल जज़्बातों की कहानी कहता है।


अब रिश्तों में हिसाब भी जुड़ गया है,

किसने कितना दिया, कौन कम रहा,

प्यार की जगह तौलने लगे हैं लोग,

कौन ज़्यादा था, कौन कम रहा।


अहं के छोटे-छोटे कण से,

मन के आईने धुंधले हो जाते हैं,

सही-गलत की भीड़ में खोकर,

अपने ही अपने से दूर हो जाते हैं।


विश्वास की डोर पतली इतनी  ,

शक की हवा से टूट जाती है,

एक छोटी-सी गलतफ़हमी भी,

सालों की नज़दीकी लूट ले जाती है।


फिर भी कहीं एक उम्मीद बची है,

कुछ रिश्ते अब भी सच्चे हैं,

जहाँ शब्द कम और एहसास गहरे,

जहाँ “हम” अब भी “मैं” से अच्छे हैं।

Friday, August 22, 2025

अंतिम धुन

 



संदेशा पहुँचा राज दरबार ,

मिलना चाहती है राधा अंतिम बार ,

द्वारकादीश भागे छोड़ सब काम ,

पहुँचे जहाँ राधा कर रही थी अंतिम विश्राम ,

"बजा दो कान्हा , फिर वही धुन ,

अब गहरी नींद सोना चाहती हूँ ,

विरह में बीती सारी ज़िन्दगी ,

वो धुन फिर सुनना चाहती हूँ। "

राधा रानी के अंतिम शब्द ,

सुन कृष्ण मुस्कराये ,

पकड़ी फिर से बाँसुरी ,

जिसे त्याग आये थे वृंदावन धाम ,

अंतिम बार अधरों से ,

बाँसुरी से धुन छेड़ी ,

राधा पहुँच गयी कानन में ,

हौले से मुस्कराई ,

कुँज की गलियों में भागी ,

गोपियों संग अठखेली,

कान्हा को देख सुधबुध खोई ,

दी माखन की डली  ,

धीरे -धीरे आँखे बंद हुई ,

दिव्य तेज शरीर से निकला ,

उर में समा गई बाँसुरी बजैया,

तोड़ दी बाँसुरी ,

अंतिम बार निहारा ,

राधे अमर रहेगा प्रेम तुम्हारा ,

कैसा आलौकिक  प्रेम था ये ,

राधे -राधे हुआ जग सारा।

Friday, September 30, 2022

उस पार

 

नहीं , वो मर नहीं सकता ,

फफक -फफक वो रो पड़ी ,

गयी भी नहीं देखने ,

अंतिम बार उसका चेहरा ,

बंधनो में जकड़ी थी ,

याद था उसको वादा ,

जो वर्षों पहले उसने ,

किया था एक दिन ,

उसने भी दोहराया था ,

बीत गए थे जाने कितने वसंत ,

वादा मगर हमेशा ताजा रहा ,

उम्मीद पर अनगिनत दिन गुजर गए ,

साँझ हो गयी जीवन की ,

मगर वादा बूढ़ा हुआ ,

आज ऐसी अनहोनी कैसे हो गयी ,

वो कैसे जा सकता था ?

अब तो मिलने के लिए ,

शायद उसको भी ,

उस पार जाना ही होगा,

बस "धड़ाम " की हल्की आवाज हुई ,

उस पार शायद मिलन ,

जरूर हुआ होगा,

इस पार तो उनका प्रेम ,

बेड़ियों में ही जकड़ा रहा। 

Saturday, February 22, 2020

स्त्री प्रेम नहीं करती !


स्त्री प्रेम नहीं करती ,
सच है , स्त्री प्रेम नहीं करती ,
प्रेम उसको समझ नहीं आता ,
क्यूंकि प्रेम में जटिलता बहुत है ,
जो उसको सुहाता नहीं ,
फिर ,
स्त्री जब प्रेम में पड़ती है तो ,
वह "समर्पण " करती है ,
वह खुद को समर्पित करती है ,
अपने प्रेमी को ,
मगर समर्पण करने से पहले ,
वह परखती है ,
जांचती है ,
परीक्षा लेती है ,
और जब उसे लगता है ,
उसका मन गवाही देता है ,
तब वह प्रेम नहीं ,
"समर्पण " कर देती है ,
सब कुछ ,
एकाकार होने के लिए ,
अपने प्रेमी में बसने के लिए ,
इसीलिए वह ,
"समर्पण " करने से पहले ,
 वक्त लेती है,
"हाँ " कहने से पहले ,
वक्त लेती है ,
प्रेम उसके लिए ,
सिर्फ प्रेम नहीं होता ,
उसका संसार होता है ,
जहाँ उसकी मुस्कान ,
उसके दर्द , उसके आँसू
सब होते है। 

Wednesday, September 11, 2019

प्रेम की सीढ़ी



आईने में खुद को सज धज कर निहारती ,
उसकी आँखों में जैसे अजब सा सुकून था ,
झील सी आँखों के ऊपर उसने ,
काजल से जैसे तटबंध बनाये थे ,
गेसुओं को करीने से पीछे बाँध कर ,
महक लिए कुछ फूल गुँथे थे ,
गालो पर हल्का हल्का ,
गुलाबी मस्कारा लगाया था ,
खुद से आईने के सामने ,
शर्मा रही थी  ,
बड़े दिनों से सजने की ,
तमन्ना को जिये जा रही थी ,
किसी दूसरे से प्रेम करने से पहले ,
खुद से प्रेम करना सीख रही थी । 

उसे आज किसी और के लिए नहीं ,
खुद के लिए सज रही थी ,
बदल बदल कर कपडे वो ,
हर रंग के साथ निखर रही थी ,
खुद से अपने चेहरे पर ,
एक काला टीका भी लगा लिया ,
नजर न लग जाए खुद की ,
चेहरा सुर्ख गुलाबी  हो गया।  
खुद से प्रेम हो रहा था उसे ,
आज वो जैसे पूर्ण हो रही थी,
प्रेम की सीढ़ी जैसे ,
आज वह चढ़ रही थी ।

फोटो सौजन्य और आभार - गूगल