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Friday, April 10, 2026

रिश्ते

आजकल रिश्ते धुंधले आईनों जैसे हैं,

चेहरे तो दिखते हैं, पर साफ़ नहीं हैं,

हर बात में एक “पर” छुपा होता है,

हर खामोशी अब लापरवाह नहीं हैं ।


बातें होती हैं, पर दिल नहीं मिलता,

हँसी भी अब थोड़ी सधी-सधी है,

लोग साथ तो चलते हैं अक्सर,

पर दूरी कहीं अंदर खड़ी है।


ऑनलाइन दिखती है अपनेपन की दुनिया,

ऑफ़लाइन सब उलझा-सा रहता है,

“टाइपिंग…” में जो ठहराव है,

वो असल जज़्बातों की कहानी कहता है।


अब रिश्तों में हिसाब भी जुड़ गया है,

किसने कितना दिया, कौन कम रहा,

प्यार की जगह तौलने लगे हैं लोग,

कौन ज़्यादा था, कौन कम रहा।


अहं के छोटे-छोटे कण से,

मन के आईने धुंधले हो जाते हैं,

सही-गलत की भीड़ में खोकर,

अपने ही अपने से दूर हो जाते हैं।


विश्वास की डोर पतली इतनी  ,

शक की हवा से टूट जाती है,

एक छोटी-सी गलतफ़हमी भी,

सालों की नज़दीकी लूट ले जाती है।


फिर भी कहीं एक उम्मीद बची है,

कुछ रिश्ते अब भी सच्चे हैं,

जहाँ शब्द कम और एहसास गहरे,

जहाँ “हम” अब भी “मैं” से अच्छे हैं।

Saturday, April 4, 2026

गड़बड़झाला

 

बहुत गड़बड़झाला चल रहा है दुनिया में,

ताकतवर कमजोर पर रौब झाड़ रहा है,

अमीर गरीब को धरती का बोझ बता रहा है,

नियमों का तमाशा हर कोई बना रहा है।

 

रिश्ते-नातों से सब कन्नी काट रहे हैं,

"प्राइवेसी" के नाम पर परिवार से कट रहे हैं,

रुपये-पैसे की अंधी दौड़ लगी है,

इंसान खुद को  बेचकर भी मुस्कुरा रहा है।

 

सच अब अखबारों में भी आधा छपता है,

झूठ हर स्क्रीन पे पूरा चमकता है,

ईमानदारी अब मूर्खता कहलाती है,

चालाकी का सिक्का हर जगह चलता है।

 

दोस्ती भी अब फायदे से तौली जाती है,

मोहब्बत शर्तों में खोली जाती है,

हर कोई खुद को भगवान समझ बैठा है,

और इंसानियत चुपचाप रोती जाती है।

 

भीड़ में हर चेहरा अकेला सा लगता है,

हर रिश्ता अब सौदे जैसा लगता है,

जो जितना ज्यादा दिखावा करता है,

वो उतना ही अंदर से खोखला लगता है।

 

पर सच ये भी है, सब कुछ खत्म नहीं,

हर दिल अब भी पत्थर नहीं,

अगर आईना खुद को दिखा सको,

तो ये गड़बड़झाला भी अटल नहीं।

Thursday, July 5, 2018

मासूम

रोज़ न जाने क्यों वो लड़की ,
घंटो आसमान को ताकती है , 
रोज़ न जाने क्यों वो लड़की , 
बगीचे के हर फूल को सूंघती है , 
रोज़ न जाने क्यों वो लड़की , 
हवा को महसूस करती है , 
रोज़ न जाने क्यों वह लड़की , 
सूरज की पहली किरण को चूमती है।  

उसकी माँ ने जाने से पहले उसे ,
बहलाने के लिए कहा था शायद , 
जब भी उसकी याद आएगी , 
आसमां में तारा बनकर वो मिलने आएगी ,
या फिर किसी फूल में खुसबू बन जाएगी ,
या हवा के ठन्डे झोंके में समाकर उसे सहलाएगी ,
या सूरज की पहली किरण बनकर उससे मिलने आएगी।  

वो मासूम जानती थी , 
उसकी माँ कभी झूठ नहीं बोलती थी , 
उसने जो बोला था , 
वह तो बस उसको जी रही थी।  

आसमान के उस तारे में उसे अपनी माँ दिखाई देती थी , 
उस गुलाब के फूल में उसे अपनी माँ की खुशबू आती थी , 
वो हवा का झोंका जब उसके गालों को छूता था , 
माँ के कोमल हाथो का स्पर्श उसे महसूस होता था , 
सूरज की पहली किरण में माँ की मुस्कान दिखती थी , 
उस मासूम को शायद एहसास नहीं था , 
माँ तो अब कभी न लौटने के लिए चली गयी थी।  

वो मासूम जानती थी , 
उसकी माँ कभी झूठ नहीं बोलती थी , 
उसने जो बोला था , 
वह तो बस उसको जी रही थी।  

Friday, May 18, 2018

कारवाँ जारी है



जीवन अपनी गति से बढ़ रहा , 
कोई आगे - कोई पीछे चल  रहा ,
किसी के माथे पर थकन की शिकन , 
कोई मदमस्त गीत गुनगुना रहा , 
देखो !जीवन कारवाँ गुजर रहा।  

किसी को क्षितिज के उस पार की चिंता , 
कोई गुबार में उलझ रहा , 
किसी को सहारे की जरुरत , 
कोई अकेला ही चल रहा ,
देखो ! जीवन कारवाँ गुजर रहा।  

कही जेठ की धूप झुलसा रही , 
कहीं चाँद अपना अमृत बरसा रहा , 
बनते - बिगड़ते रिश्तो के बीच , 
प्रेम अपनी राह खुद बना रहा , 
देखो ! जीवन कारवाँ चल रहा।  

सब उम्मीदों को सहारा बनाकर , 
यादों की गठरी उठाकर , 
अपने सफर को यादगार बनाने की कशमकश में ,
चला जा रहा,
देखो ! जीवन कारवाँ चल रहा।  

किसी की ख्वाहिशें पनप रही , 
किसी को सफर लम्बा लग रहा , 
जो अँधेरे में भी साहस न छोड़े , 
उसका सफर आरामदायक कट रहा ,
देखो ! जीवन कारवाँ चल रहा।  

राहों में कही फूल बिखरे पड़े , 
कही काटों से भी पाला पड़ रहा , 
संतुलित होकर जो चल रहा , 
इस कारवाँ का आनंद वही ले रहा , 
देखो ! जीवन कारवाँ चल रहा।  

चलना अकेले ही है , कुछ साथ आ गए तो अच्छा है , 
कहकहे लगाते आगे बढ़ते रहिये ,
सुख -दुःख बाँटते हुए चलते रहिये, 
आपके पदचिन्हो पर वो देखो, 
कोई चल कर अब आगे बढ़ रहा , 
देखो ! जीवन कारवाँ चल रहा।  

Thursday, November 2, 2017

एक पत्र - - पिता का पुत्र के नाम


प्रिय पुत्र , चिरंजीवी रहो,  
सदा खुश और आबाद रहो । 
आज तुम्हारी याद आयी,
आँखे मेरी भर आयी ।। 

जब तू छोटा था , खूब रोता था ,  
बात बात पर जिद्द करता था।
माँ का तुझपर बड़ा लाड़ था,
तेरी जिद्द पूरी हो , दो - दो जगह नौकरी करता था ।

तू हमारी आँखों का तारा था , सपनो का सितारा था। 
हमारे जीने का तू ही सहारा था।। 
तेरे सपनो के आगे, हम भी झुक गए। 
तुझे विदेश जाने की अनुमति देकर, हम आधे उसी दिन मर गए।।

तेरी माँ तेरे इन्तजार में खप गयी ,
मेरी ज़िन्दगी उजाड़ हो गयी। 
तू अपनी दुनिया में रम गया ,
मैं बुढ़ापे में अनाथ हो गया।।

तेरी बहन आ जाती है कभी कभार,
" पापा , आप हमारे साथ रहो " कहती है हर बार ।
उसको मैं हर बार समझाता हूँ, 
तेरी माँ और तुम्हारी यादो का खजाना हैं इस घर में मेरे साथ।

बहुत खाली सा महसूस होता है जीवन ,
इसका भार अब नहीं उठता। 
वसीयत तेरे नाम लिख दी है ,
अपना हक़ समझकर रख लेना ।।

अपने बच्चो का खूब ख्याल रखना , 
अपने स्वास्थ्य को ठीक रखना ।
कभी आये याद मेरी तो ,
फोन जरूर करना। 

आशीष बना रहे तुझपर , तू खूब तरक्की करें। 
जहाँ भी रहें , खुश रहे।।