बहुत गड़बड़झाला चल रहा है दुनिया में,
ताकतवर कमजोर पर रौब झाड़ रहा है,
अमीर गरीब को धरती का बोझ बता रहा है,
नियमों का तमाशा हर कोई बना रहा है।
रिश्ते-नातों से सब कन्नी काट रहे हैं,
"प्राइवेसी" के नाम पर परिवार से कट रहे हैं,
रुपये-पैसे की अंधी दौड़ लगी है,
इंसान खुद को बेचकर भी मुस्कुरा रहा है।
सच अब अखबारों में भी आधा छपता है,
झूठ हर स्क्रीन पे पूरा चमकता है,
ईमानदारी अब मूर्खता कहलाती है,
चालाकी का सिक्का हर जगह चलता है।
दोस्ती भी अब फायदे से तौली जाती है,
मोहब्बत शर्तों में खोली जाती है,
हर कोई खुद को भगवान समझ बैठा है,
और इंसानियत चुपचाप रोती जाती है।
भीड़ में हर चेहरा अकेला सा लगता है,
हर रिश्ता अब सौदे जैसा लगता है,
जो जितना ज्यादा दिखावा करता है,
वो उतना ही अंदर से खोखला लगता है।
पर सच ये भी है, सब कुछ खत्म नहीं,
हर दिल अब भी पत्थर नहीं,
अगर आईना खुद को दिखा सको,
तो ये गड़बड़झाला भी अटल नहीं।
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