आजकल रिश्ते धुंधले आईनों जैसे हैं,
चेहरे तो दिखते हैं, पर साफ़ नहीं हैं,
हर बात में एक “पर” छुपा होता है,
हर खामोशी अब लापरवाह नहीं हैं ।
बातें होती हैं, पर दिल नहीं मिलता,
हँसी भी अब थोड़ी सधी-सधी है,
लोग साथ तो चलते हैं अक्सर,
पर दूरी कहीं अंदर खड़ी है।
ऑनलाइन दिखती है अपनेपन की दुनिया,
ऑफ़लाइन सब उलझा-सा रहता है,
“टाइपिंग…” में जो ठहराव है,
वो असल जज़्बातों की कहानी कहता है।
अब रिश्तों में हिसाब भी जुड़ गया है,
किसने कितना दिया, कौन कम रहा,
प्यार की जगह तौलने लगे हैं लोग,
कौन ज़्यादा था, कौन कम रहा।
अहं के छोटे-छोटे कण से,
मन के आईने धुंधले हो जाते हैं,
सही-गलत की भीड़ में खोकर,
अपने ही अपने से दूर हो जाते हैं।
विश्वास की डोर पतली इतनी ,
शक की हवा से टूट जाती है,
एक छोटी-सी गलतफ़हमी भी,
सालों की नज़दीकी लूट ले जाती है।
फिर भी कहीं एक उम्मीद बची है,
कुछ रिश्ते अब भी सच्चे हैं,
जहाँ शब्द कम और एहसास गहरे,
जहाँ “हम” अब भी “मैं” से अच्छे हैं।
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