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Saturday, February 22, 2020

स्त्री प्रेम नहीं करती !


स्त्री प्रेम नहीं करती ,
सच है , स्त्री प्रेम नहीं करती ,
प्रेम उसको समझ नहीं आता ,
क्यूंकि प्रेम में जटिलता बहुत है ,
जो उसको सुहाता नहीं ,
फिर ,
स्त्री जब प्रेम में पड़ती है तो ,
वह "समर्पण " करती है ,
वह खुद को समर्पित करती है ,
अपने प्रेमी को ,
मगर समर्पण करने से पहले ,
वह परखती है ,
जांचती है ,
परीक्षा लेती है ,
और जब उसे लगता है ,
उसका मन गवाही देता है ,
तब वह प्रेम नहीं ,
"समर्पण " कर देती है ,
सब कुछ ,
एकाकार होने के लिए ,
अपने प्रेमी में बसने के लिए ,
इसीलिए वह ,
"समर्पण " करने से पहले ,
 वक्त लेती है,
"हाँ " कहने से पहले ,
वक्त लेती है ,
प्रेम उसके लिए ,
सिर्फ प्रेम नहीं होता ,
उसका संसार होता है ,
जहाँ उसकी मुस्कान ,
उसके दर्द , उसके आँसू
सब होते है। 

Tuesday, October 23, 2018

जरुरत



ज़िन्दगी वादा है तुझसे ,
ऐसा जियूँगा तुझे ,
की तू भी रश्क करेगी ,
जिस हाल में भी रखेगी तू ,
हर हाल में मुस्कराता मिलूँगा मैं।  

ले ले इम्तेहान कई ,
गुरेज नहीं अब कोई भी , 
एक ही धागे से लिपटे है हम दोनों ,
तेरी उठापटक से अनजान नहीं हूँ ,
बस तेरा मंतव्य समझने लगा हूँ मैं।   

मुझे तेरी जरुरत , 
तू भी मुझबिन अधूरी सी ,
चल " मैं " से "हम " हो जाते है , 
समाहित हो जाते है इस कदर ,
न तू कभी अलग दिखे और न मैं।