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Wednesday, September 11, 2019

प्रेम की सीढ़ी



आईने में खुद को सज धज कर निहारती ,
उसकी आँखों में जैसे अजब सा सुकून था ,
झील सी आँखों के ऊपर उसने ,
काजल से जैसे तटबंध बनाये थे ,
गेसुओं को करीने से पीछे बाँध कर ,
महक लिए कुछ फूल गुँथे थे ,
गालो पर हल्का हल्का ,
गुलाबी मस्कारा लगाया था ,
खुद से आईने के सामने ,
शर्मा रही थी  ,
बड़े दिनों से सजने की ,
तमन्ना को जिये जा रही थी ,
किसी दूसरे से प्रेम करने से पहले ,
खुद से प्रेम करना सीख रही थी । 

उसे आज किसी और के लिए नहीं ,
खुद के लिए सज रही थी ,
बदल बदल कर कपडे वो ,
हर रंग के साथ निखर रही थी ,
खुद से अपने चेहरे पर ,
एक काला टीका भी लगा लिया ,
नजर न लग जाए खुद की ,
चेहरा सुर्ख गुलाबी  हो गया।  
खुद से प्रेम हो रहा था उसे ,
आज वो जैसे पूर्ण हो रही थी,
प्रेम की सीढ़ी जैसे ,
आज वह चढ़ रही थी ।

फोटो सौजन्य और आभार - गूगल 

Wednesday, October 3, 2018

इश्क का चक्रव्यूह (हास्य )



किसी को देखने की चाहत दिल में मचलने लगे , 
यूँ ही अचानक से मुस्कराहट होंठो पर तैरने लगे , 
आँखे उनके दीदार को तरसने लगे , 
इश्क चक्रव्यूह के पहले द्वार पर आप दस्तक देने लगे।  

उनसे मिलने को जब दिल करने लगे , 
बातें उनकी जब मीठी लगे , 
आँखों में अब उनकी तस्वीर दिखने लगे , 
चक्रव्यूह के दूसरे दरवाजे तक आप पहुँचने लगे ।  

दिल में जब हरारत होने लगे , 
बिना बात किये दिल न भरे , 
रात को नींद कम , सपने ज्यादा आने लगे ,
इश्क चक्रव्यूह का तीसरा दरवाजा भी आप भेद गए।  

हर पल उनका साथ जब भाने लगे , 
उनके बगैर अब ज़िन्दगी बेमानी लगे , 
राते खयालो में गुजरने लगे  , 
चौथा दरवाजा भी इश्क का आप तोड़ चले।  

न दिन को सुकून , न रात को चैन मिले ,
हर वक्त उनका ही ख्याल रहे , 
भीड़ में भी उनका ही चेहरा ढूंढने लगे , 
पाँचवा दरवाजा खुद ब खुद खुलने लगे ।  

उनका हर सपना जब अपना लगे , 
प्यार भरे नग्मे अब खुद की कहानी कहने लगे , 
उनके आंसुओ से खुद की आँखों की कोरे गीली होने लगे ,
समझिये , इश्क के अंतिम पायदान पर आप पहुँच गए।  

जब ज़िन्दगी में उनके बिना कुछ भी न भाने लगे , 
उनकी हर ज़िद्द जब आपको अच्छी लगने लगे , 
तमाम और रिश्ते जब आपको दोयम लगने लगे , 
बधाई हो , इश्क चक्रव्यूह के "केंद्र " में पहुँच गए ।

Friday, July 20, 2018

मॉडर्न वाला इश्क ( व्यंग्य )




सुना है इश्क का रंग बड़ा गहरा होता है ,
जिसे हो जाये , बस उसे ही लगता है 
पर आज के जमाने को देखकर लगता है , 
लद गए वो जमाने अब , 
मॉडर्न वाला इश्क चलता है।    

व्यावहारिक हो गया है इश्क अब , 
कई कसौटियों पर तुलता है , 
दिल से नहीं गुजरता अब , 
दिमाग में पहले उतरता है।  

नहीं रही अब वो संजीदगी , 
इश्क होने से पहले ब्रेकअप हो जाता है , 
तू न सही , और कोई सही , 
फार्मूला हर बार काम कर जाता है।  

इश्क अब यूँ ही नहीं होता , 
पूरी पड़ताल के बाद होता है , 
नजरे मिलाने से पहले , 
उसका फेसबुक, ट्विटर और इंस्ट्रागाम जरूर चेक होता है।  

जरुरी भी है वक्त बदल गया है , 
समय के साथ जरूर चलना चाहिए , 
इश्क को भी इस दौर के इम्तेहान देने चाहिए , 
उसकी "हां" या "न " के इंतजार के बीच दो चार ऑप्शन और होने चाहिए।