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Wednesday, July 24, 2019

मन के मौसम हजार


मन के मौसम हजार ,
बदलते बार बार ,
कभी जेठ की दुपहरी सा ,
कभी सावन की फुहार। 

कभी ठंडा जनवरी सा ,
कभी मार्च की पुरवाई ,
कभी शांत समदंर सा ,
कभी नदियाँ की अंगड़ाई। 

कभी बंजर धरती सा ,
कभी खिले फूलो के उपवन सा ,
कभी जोश भरा लबालब ,
कभी पतझड़ सा। 

कभी डूबा डूबा सा ,
कभी हर कोना खाली सा ,
कभी बजती शहनाई ,
कभी मौसम रुसवाई सा। 

कभी गुस्से सा ,
कभी प्यार के सागर सा ,
घड़ी घड़ी  बदलता रहता है ,
चंचल है चकोर सा ।    


Friday, July 20, 2018

मॉडर्न वाला इश्क ( व्यंग्य )




सुना है इश्क का रंग बड़ा गहरा होता है ,
जिसे हो जाये , बस उसे ही लगता है 
पर आज के जमाने को देखकर लगता है , 
लद गए वो जमाने अब , 
मॉडर्न वाला इश्क चलता है।    

व्यावहारिक हो गया है इश्क अब , 
कई कसौटियों पर तुलता है , 
दिल से नहीं गुजरता अब , 
दिमाग में पहले उतरता है।  

नहीं रही अब वो संजीदगी , 
इश्क होने से पहले ब्रेकअप हो जाता है , 
तू न सही , और कोई सही , 
फार्मूला हर बार काम कर जाता है।  

इश्क अब यूँ ही नहीं होता , 
पूरी पड़ताल के बाद होता है , 
नजरे मिलाने से पहले , 
उसका फेसबुक, ट्विटर और इंस्ट्रागाम जरूर चेक होता है।  

जरुरी भी है वक्त बदल गया है , 
समय के साथ जरूर चलना चाहिए , 
इश्क को भी इस दौर के इम्तेहान देने चाहिए , 
उसकी "हां" या "न " के इंतजार के बीच दो चार ऑप्शन और होने चाहिए।