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Monday, March 16, 2026

स्वर्ग

काश की दुनियाँ ऐसी होती,
हर दहलीज में खुशियां होती,
मांगते सब एक दूसरे के लिये दुआएँ,
यही दुनियाँ क्या स्वर्ग नहीं होती।

काश की शब्द सही इस्तेमाल होते,
नश्तर बन किसी सीने में चुभते,
मीठे बोलों से सजती ये दुनिया,
शायद महाभारत भी होती।

काश की मस्तिष्क सृजन ही करता,
विध्वंस की कल्पना भी होती,
अपनी सरहदों तक सीमित रहते,
फिर कोई जंग भी नहीं होती।

काश कि दिलों में प्रेम ही बसता,
नफरत की कोई जगह होती,
हाथ बढ़ते सहारा देने को,
किसी की आँख कभी नम होती।

काश कि इंसान इंसान रहता,
स्वार्थ की कोई दीवार होती,
दर्द समझ लेते सब एक-दूजे का,
तो जिंदगी इतनी लाचार होती।

काश कि धरती मुस्कुराती रहती,
हर ओर हरियाली की छाँव होती,
लोभ की आग जलती मन में,
तो यह दुनिया सच में स्वर्ग सी होती।


Sunday, August 31, 2025

नया वर्ल्ड आर्डर

 मानो तो मोदी है ,

न मानो तो ट्रम्प ,

संशय तो राहुल पर है ,

ज़ेलेन्स्की तो निशाने पर है ही। 

 

पुतिन अटल है , अडिग है ,

शी जिनपिंग खेल रहे गेम नई ,

यूरोप माथा पीट रहा ,

कौन गलत , कौन सही। 

 

अफ्रीका वाले मस्त है ,

देख रहे खेल सभी ,

करेंगे भी क्या वो वर्ल्ड आर्डर से ,

उनके घर के हालात ही सही नहीं। 

 

टैरिफ के चक्कर में ,

दुनिया बनी पड़ी है घनचक्कर ,

जबरदस्ती बॉस बनने पर तुला अमेरिका ,

पिछलग्गू है देश कई। 

 

तय होगा नया वर्ल्ड आर्डर ,

बन रहे है ध्रुव कई ,

बारूद के ढेर पर ,

लग न जाए चिंगारी कहीं। 

Monday, August 5, 2024

शांति

 


 इंसान बमुश्किल शांति से रह सकता है ,

उसे शांति हजम नहीं होती ,

वो खुद को उलझा के रखना चाहता है ,

कभी युद्ध में , कभी विवादों में ,

कभी बेफिजूल बातों में ,

फिर भी वह शांति से जीना चाहता है ,

अपने स्वभाव के विपरीत ,

मगर जानते है कुछ लोग ,

उसके अंदर का यह सच ,

वो उठाते है इसका फायदा ,

अपने स्वार्थो के लिए ,

उलझाकर रखना चाहते है सबको ,

ताकि वो साबित कर सके खुद को ,

सबसे बड़ा हितैषी इंसानो का ,

और भोग सके वो तमाम सुख ,

जो पैदा हुए है शांति की राख पर। 

Friday, October 12, 2018

कश्मकश


गुजर रही थी ज़िन्दगी सुकून से, 
ख्वाईशो ने लफड़े कर दिए , 
उम्र गुजरती रही , 
और ये बढ़ते रहे।  

न मिला फिर चैन-ओ -सुकून ,
बस भागते रहे , 
इस भागमभाग में , 
दिन बीतते रहे।  

दिल ने कई बार टोका , 
दिमाग ने हामी न भरी , 
दोनों की कश्मकश में , 
हम पीसते रह गए।  

कुछ अदद जरूरते ही तो थी हमारी , 
उनसे ऊपर ऐशो आराम जुटाने में लग गए ,
लगी ऐसी लत की , 
ऐश और आराम दोनों भूल गए।  

ज़िन्दगी गाहे बगाहे चेताती रही ,
हम अनुसना कर आगे बढ़ते रहे , 
अच्छे "कल " के इन्तजार में , 
हम "आज " को खोते रहे।  

सुकून की तलाश में शुरू किया था जो सफर , 
तनाव में हर वक्त रहने लगे , 
एक किनारे से चले थे हम , 
दूसरे किनारे पर न जाने कैसे पहुँच गए।  

Saturday, March 25, 2017

किंकर्तव्यविमूढ़

मेरा देश बड़ी  मुश्किल में हैं , इधर जाये या उधर जाये ! 
बड़ा किंकर्तव्यविमूढ़ सा हैं !! 

विकास की दौड़ में सबसे आगे रहना चाहता है , 
फिर घर की हालात देखकर ठिठक जाता हैं , 

खुशहाल बनने की ललक दिल में हैं , 
किसानों की दशा देखकर सहम जाता हैं , 

बराबरी का हक़ सबको मिले , 
महिलाओ पर होते अत्याचारो से जार जार रोता हैं, 

पूरे विश्व में शांति दूत बनना चाहता हैं , 
पड़ोसियों की हरकतों से बार बार जख्म खाता हैं , 

संताने उसकी मुक्कमल जहां बनाये , 
बढ़ती बेरोजगारी - हथोड़े सा वार करता हैं , 

सबको तरक्की के अवसर मिले , 
भ्रस्टाचार और बेईमानी राह में रोड़ा बनता हैं , 

सर्वधर्म समभाव रहे , 
कुछ लोगो को ये अखरता हैं , 

उम्मीद अभी हैं उसे , 
सदियो से वजूद उसका यूँ ही  कायम नहीं  हैं , 

उठ खड़े होंगे जब ढाई सौ अरब हाथ इक दिन , 
दुनिया में उसके जैसा फिर कोई नहीं हैं।