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Friday, March 6, 2026

बसंत

 


मंद समीर सुहावनी, डोले तरु की डाल,
कोयल मीठे राग में, गाए नवल धमाल।

पीत वसन धरती धरे, सरसों हँसे अपार,
भ्रमर गुंजारें फूल पर, छाए मधु के हार।

नव पल्लव की छाँव में, जग का बदले रूप,
जीवन में आशा जगे, जैसे फैली बिखरी धूप।

ऋतुराज के आगमन से, खिल उठे सब प्राण,
प्रेम-सुगंधित हो उठे, मन, उपवन, और त्राण।

Wednesday, February 11, 2026

बसंत

 


 

आओ बसंत , छा जाओ बसंत ,

कुम्हला रही कपोलों में प्राण भरो बसंत ,

रूखी हवाओं में ताप भरो बसंत ,

निर्मोही मन में बासन्ती रंग भरो बसंत। 

 

सुप्त पड़ी धरा को उष्मित करो बसंत ,

सूखी डालियों को फिर लहलहाओ बसंत ,

कलरव का संगीत बजाओ बसंत ,

मुरझाये से मन में फाग भरो बसंत।