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Sunday, March 15, 2026

चाँद

 


हर उम्र ने चाँद को अपनी नज़र से देखा,

बचपन ने उसको “मामा” ही समझा,

अल्हड़पन में दिखाई दिया वो सफ़ेद गोला,

जवानी ने उसमें महबूब का दीदार किया।

 

ढलती उम्र ने उसमें दाग खोज लिये,

बुढ़ापे ने चाँद को एक उपग्रह माना,

हर दौर ने अपनी रवानी देखी,

चाँद वही रहा, उम्र ने अपनी सोच पहचानी।

 

कभी चाँद कहानी बना, कभी हक़ीक़त बना,

कभी सपनों का साथी, कभी विज्ञान का किस्सा बना,

असल में बदलता रहा सिर्फ़ देखने वाला,

वरना चाँद तो सदियों से वैसा ही रहा ।

 

समय ने आँखों को तजुर्बों से भर दिया,

मासूमियत को धीरे-धीरे असर दिया,

हमने ही हर पड़ाव पर अर्थ बदल डाले,

आसमान ने तो बस वही नज़ारा कर दिया।

 

आख़िर समझ में ये राज़ भी आ ही गया,

हर चेहरा दरअसल आईना बन ही गया,

चाँद में जो देखा वो चाँद में कहाँ था,

वो तो दिल था जो हर उम्र में बदल गया।