Friday, October 2, 2026

बैचैन मन

 

हालातों पर करीब से निगाह रख रहा हूँ,

जिधर देखूँ, उधर बेचैनी देख रहा हूँ,

भागते फिरते सबको इधर-उधर,

सबको कुछ न कुछ खोजता देख रहा हूँ।

 

कुछ तो छिपा हुआ है कहीं,

दौड़ का अजब दौर देख रहा हूँ,

बदहवास हुए हैं सारे लोग,

माथों पर गहरी शिकन देख रहा हूँ।

 

देख रहा हूँ अजीब-से मंजर,

संशय के बादल घिरे देख रहा हूँ,

न जाने कहाँ खो गई विश्वास की डोर,

हर नज़र में संदेह भरे देख रहा हूँ।

 

हर कोई अनजानी मंज़िल की ओर,

बिना जाने ही बढ़ता देख रहा हूँ,

किसी को समय से आगे भागते,

किसी को समय से लड़ते देख रहा हूँ।

 

हाथों में सबके साधन बहुत हैं,

फिर भी खाली मन देख रहा हूँ,

हँसी चेहरों पर सजी हुई है,

आँखों में छिपी नमी देख रहा हूँ।

 

रिश्ते भी अब सवालों में हैं,

हर बात को तौलते देख रहा हूँ,

अपने ही अपनों से बचते फिरते,

विश्वास को सिसकते देख रहा हूँ।

 

राजनीति का गिरता स्तर देख रहा हूँ ,

नेताओं को गिरगिट बनते देख रहा हूँ ,

पार्टियों के चक्कर में ,

भाई -भाई के बीच झगड़ा देख रहा हूँ। 

 

देख रहा हूँ इस दौर को,

उम्मीद को भी पलते देख रहा हूँ,

अँधेरा चाहे जितना गहरा हो,

दूर कहीं उजाला देख रहा हूँ।

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