घूम यायावर,
देख दुनिया,
पहाड़ देख,
मैदान देख,
देख झील-झरने,
रेगिस्तान देख,
समंदर देख,
देख बर्फ़ से ढकी पर्वतमालाएँ,
प्रकृति का हर रूप देख।
ऊँट के कूबड़ देख,
हाथी की चाल देख,
देख शेर का अंदाज़,
मानुस हर जगह के देख,
प्रकृति का सामंजस्य देख।
उठ यायावर,
दुनिया देख।
कहीं सूरज को उगते देख,
कहीं शाम को ढलते देख,
कहीं चाँद को निहारते लोग,
कहीं तारों के नीचे पलते देख।
कहीं रोटी के लिए संघर्ष देख,
कहीं दौलत का अंबार देख,
कहीं रिश्तों की गर्माहट देख,
कहीं अपनों के बीच दीवार देख।
कहीं भाषा बदले, कहीं वेश बदले,
कहीं पूजा के तरीके देख,
कहीं रंग अनेक, कहीं धर्म अनेक,
पर सबमें धड़कते दिल एक देख।
कहीं पर्वत-सा धैर्य देख,
कहीं नदी-सा बहाव,
कहीं ठहराव में छिपी शांति,
कहीं लहरों का उन्मुक्त स्वभाव।
कभी पगडंडियों पर चलकर देख,
कभी अनजान राहों पर निकलकर देख,
किताबों में जो नहीं मिलता,
वो अनुभवों से सीखकर देख।
उठ यायावर,
दुनिया देख,
और लौटे जब अपने घर,
तो पहले जैसा मत लौट,
कुछ नज़रिया बदलकर ला,
कुछ इंसानियत बढ़ाकर ला,
कुछ अनुभवों की रोशनी,
अपने भीतर भरकर ला।
उठ यायावर,
दुनिया देख,
ज़िंदगी को जीकर देख!
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