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Tuesday, July 4, 2023

अल्हड़पन

 

बात अलग थी उस अल्हड़पन में ,

जब मौजो का इक दरिया बहता था ,

खाली होती थे जेब हमारी ,

दरियादिली का समंदर बहता था। 

 

मंजिल का पता नहीं था मगर ,

बेमकसद घूमना एक शगल था ,

नफे -नुकसान की किसको परवाह थी ,

हर शक्ल में इक दोस्त दिखता था।

 

आसमां को मुट्ठी में करने की ललक थी ,

हवाओं से बातें अक्सर होती थी ,

पता नहीं था -क्या होगा भविष्य में ,

पल -पल जी लेने की अजब हसरत थी। 

 

चाँद को आगोश में लेने का सपना था ,

सूरज से आँखे मिलाने की जुर्रत  थी ,

इक नन्हा सा ख्वाब पलता था आँखों में ,

हमारी कागज़ की नाव पानी में तैरती थी। 

 

खुली आँखों में कुछ सपने थे,

हर सपने की इक हरारत थी ,

कहाँ परवाह थी तूफानों की ,

तूफानों से अपनी नूरा -कुश्ती थी। 

 

नियम -कानून सब बासी लगते थे ,

विद्रोह की चिंगारी सुलगती थी ,

अम्मा -बाबूजी की सुलझी बातें,

दिमाग में उलझन पैदा करती थी।  

 

बात अलग थी उस अल्हड़पन में ,

जब मौजो का इक दरिया बहता था ,

खाली होती थे जेब हमारी ,

दरियादिली का समंदर बहता था।

Thursday, June 13, 2019

बचपन की यारी


चल , भागते है 
कटी पतंग लाते है , 
आ जरा , पानी में छपकी , 
दोनों पैरो से लगाते है।  

थक गया , मेरे कंधे में हाथ रख , 
स्कूल जाते है , 
रास्ते में वो आम का पेड़ है न , 
दो चार आम चुराते है।  

फिक्र मत कर होम वर्क की , 
मैं भी फाड़ देता हूँ , 
चल , क्लास में दोनों , 
साथ में डाँट खाते है।  

आज मैं तेरी पसंद की सब्जी लाया हूँ , 
दोनों मिलकर खाएंगे , 
तेरे घर की रोटी में बहुत स्वाद है , 
मिलकर मौज उड़ायेंगे।  

जब मैं बड़ा होऊँगा , 
बहुत बड़ा आदमी बनूँगा , 
तू फिक्र मत कर , 
तुझे भी साथ रखूँगा।  

छुट्टी के बाद , 
साथ घर वापस जायेंगे , 
उसने कल पन्गा किया था न , 
आज उसको मिलकर मजा चखायेंगे।  

देखना , एक दिन हमारा राज होगा ,
हमारी दोस्ती पर नाज होगा , 
छू लेंगे आसमान भी  , 
जब तू मेरे साथ होगा।  

फोटो साभार - गूगल 

Sunday, January 14, 2018

पुरानी डायरी

कुछ ढूंढते ढूंढते , 
मिली मुझे मेरी वह पुरानी डायरी , 
जिसे मैं शायद कब का भूल गया था , 
उसका कवर भी अब जैसे दम तोड गया था , 

हाथो से उस पर लगी धूल  झाड़ी , 
पहले पन्ना खोला , 
तो जैसे मुस्करा रहा था , 
कितने सालो के बाद साक्षात्कार , 
हो रहा था ,
पूछ रही थी शायद , 
कहाँ  थे " इतने साल " ? 

उस डायरी का मेरी ज़िन्दगी से बड़ा लगाव था , 
उसके हर पन्ने पर मेरा एक ख्वाब था , 
मेरी अल्हड़पन की ख्वाईशो का , 
वो पुलिंदा था , 
मेरी हसरतो का जैसे वो , 
पूरा चिटठा था।  

मेरी दोस्तों के हस्ताक्षरो से , 
किसी पन्ने पर वो डायरी सजी थी , 
मेरी अधपकी कविताओं के  , 
बोझ से वह मर रही थी।  

कुछ लैंडलाइन नंबर अब भी , 
उसमे चमक रहे थे , 
कुछ लोगो के पते , 
अब भी उसमे लिखे थे।  

कुछ पन्नो पर " गणित के सूत्र " ,
अब भी लिखे थे , 
कई पन्ने " हिंदी गानो " से , 
भरे थे।  

कुछ चिट्ठिया 'अन्तर्देशी पत्र ' की शक्ल में , 
पन्नो के बीच में दबी पड़ी थी , 
अंतिम पन्ने -मेरी पेंसिल से , 
बने चित्रों से अटे पड़े थे।  

किसी पन्ने में ख़ुशी के पल थे , 
किसी पन्ने में स्याह रंग थे , 
कोई पन्ना तो अब भी कोरा था , 
किसी पन्ने पर महान " प्रेरणादायी" विचार चमक रहे थे।    

एक पल जैसे सारा बीता बचपन जी गया , 
उन सुनहरी यादो में खो गया , 
जहाँ से चलकर अब मैं खड़ा था , 
उस डायरी के एक एक पन्ने पर अद्धभुत जीवन था।    

Tuesday, September 12, 2017

खिलने दो , महकने दो

खिलने दो , महकने दो ,
हमको भी जीने दो ,
खुदा ने भेजा हैं हमको ,
बड़ी रहमतो और मुद्दत के बाद ,
हमको भी जीने दो।

कलियाँ हैं हम , 
हमें भी फूल बनने दो , 
यूँ बेरहमी से मत कुचलो , 
कुछ तो उस खुदा से डरो।  

डरा डरा सा बचपन बीत रहा , 
क्यों हर जगह इंसान रुपी जानवर दिख रहा ?
क्या कसूर हैं हमारा  ?
कोई हमें नहीं बतला रहा।  

सब कहते हैं हम देश का भविष्य हैं , 
क्यों फिर भविष्य इतना डर में पल रहा ?
महफूज नहीं जगह कोई , 
क्यों हर जगह अंधकार पसर रहा।  

खिलने दो , महकने दो 
हमें भी सपने पूरे करने दो , 
हमें भी पूरा जीवन जीना हैं , 
इतना तो रहम करो।  

Thursday, September 7, 2017

बचपना




बड़प्पन का लबादा ओढ़े बहुत दिन हो गए , 
चलो थोड़ा बचपना करते  है।
रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से उकता गए हैं , 
थोड़ा आवारागर्दी का लुफ्त उठाते हैं।  

सोचने का काम दुसरो को देकर , 
चलो , बिना बात के खिलखिलाते हैं।
मन जरा हल्का करते हैं , 
चलो थोड़ा बच्चा बनते हैं ।   

है ज़िन्दगी में कई समस्याएं , 
है होगी कल की फिक्र , 
है जिम्मेदारियों का बोझ बहुत , 
कभी कभी इनको थोड़ा अनदेखा करते है , 
चलो , थोड़ी देर  ज़िन्दगी से कुछ पल चुराते हैं ,
आओ की , थोड़ा बचपना फिर जीते है।