जीवन इक तराजू सा देखा ,
दो पलड़े - सुःख -दुःख का लेखा ,
इक पलड़े में खुशियों की उजली धूप ,
दूजे में आँसुओं का भीगा रूप।
जब सुःख का पलड़ा झुकता है ,
मन मयूरा सा नाचता है ,
रंग बिरंगे सपनों की छाया ,
हर दिशा में उजियारा पाता हैं।
जब दुःख का पलड़ा भारी ,
जीवन दुश्कर सा लगता हैं ,
खुद को कोसने लगता है जीवन ,
चैन कहाँ फिर पाता हैं।
दोनों का संतुलन ही जीवन है ,
यही सच्चा उसका साधन है ,
सुःख -दुःख के दोनों पलड़े ,
इन्ही में छिपा जीवन सार है।
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