Saturday, February 21, 2026

तराजू सा जीवन

 

जीवन इक तराजू सा देखा ,

दो पलड़े - सुःख -दुःख का लेखा ,

इक पलड़े में खुशियों की उजली धूप ,

दूजे में आँसुओं का भीगा रूप। 

 

जब सुःख का पलड़ा झुकता है ,

मन मयूरा सा नाचता है ,

रंग बिरंगे सपनों की छाया ,

हर दिशा में उजियारा पाता हैं। 

 

जब दुःख का पलड़ा भारी ,

जीवन दुश्कर सा लगता हैं ,

खुद को कोसने लगता है जीवन ,

चैन कहाँ फिर पाता हैं। 

 

दोनों का संतुलन ही जीवन है ,

यही सच्चा उसका साधन है ,

सुःख -दुःख के दोनों पलड़े ,

इन्ही में छिपा जीवन सार है। 

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