Thursday, August 2, 2018

रोज़ लिखता हूँ


जो थोड़े से शब्द है , 
उनको पिरोकर कुछ लिख लेता हूँ , 
भावनाओ की स्याही से , 
कागज पर कभी आँसू , कभी मुस्कान रख देता हूँ। 

उड़ते रहते है ये कागज मेरे कमरे में , 
मैं भी जानबूझकर इन्हे खुला रखता हूँ , 
किसी पन्ने से आँसू टपकते है , 
किसी पन्ने पर कहकहे लगते है।  

शायद ज़िन्दगी भी तो ऐसी ही है , 
जहाँ आँसू और हँसी साथ साथ चलते है , 
कुछ यादों की गठरी , कुछ ख्वाब कल के , 
आज में हम यहीं तो जीते है।  

कुछ कवितायेँ , कुछ कहानियाँ रचता रहता हूँ 
शब्दों की दुनिया में "फ़कीर " जैसा लगता हूँ , 
सीखता रहता हूँ शब्दों को करीने से सजाना , 
कभी तो बोल उठेंगे "मेरे शब्द" भी - इस उम्मीद में रोज़ लिखता हूँ।  

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