Thursday, August 23, 2018

बारिश की बूँदे

ये बारिश की बूँदे कितनी मनचली है , 
देखो ! कैसे बेबाक और बेख़ौफ़ बरसती है , 
इसको चिंता नहीं धरा के प्यास की , 
देखो, ये आसमान में  कैसे अठखेलियाँ खेलती है।  

इन्हे न अपना घर छोड़ने का मलाल , 
वो मखमली , मुलायम और रूई की फाँक जैसा आराम ,
बिना रोक टोक और बंधन के , 
जी सकती थी , फिर क्यों नहीं समझती ये नादान।  

धम्म से गिरती है कठोर धरातल पर , 
दर्द से उछलती है कई बार , 
फिर जैसे समझौता कर लेती है , 
धरा से मिलकर जैसे अपना अस्तित्व समाहित कर देती है।  

धरातल मिलकर बूँद के साथ , 
अपने को सजा लेता है , 
प्रंशसा फिर उसी की होती है , 
"बूँद " की किस्मत में तो सिर्फ त्याग होता है।  

नासमझ धरातल फिर भी अपनी अकड़ में रहता है , 
जैसे इसको अपना अधिकार समझता है , 
मगर उसका ये गुरूर तब टूटता है , 
वो "बूँद " जब सैलाब बनता है।  



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