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Monday, July 28, 2025

सावन

उमड़ घुमड़ मेघों का आच्छादन, 

नीले अम्बर पर जैसे श्वेतावरण , 

अठखेलियाँ खेलते संग समीरण , 

कोहरे से धुऑं -धुआँ वातावरण।  


कोई श्वेत वर्ण, कोई श्यामवर्ण , 

करते जोर -शोर से गर्जन ,

तरुवर सब निहारे नभ को , 

बूँदो से फिर दृश्य धरा विहँगम।  


रोम - रोम पुलकित धरा का , 

हरा -भरा चहुँओर आवरण , 

पपीहे -मयूरा सब नाचे पँख फैला , 

झूम -झूम बरसे जब सावन।  


पुलकित रज का कण -कण  , 

बूँदो की छुअन अप्रतिम , 

खिले हुए से तन -मन सारे , 

बरसे जब भी पीयूष सावन।  

Friday, July 5, 2019

बारिश की पहली बूँद

बारिश की पहली बूँद 
जब धरा पर गिरी , 
सूखी मिट्टी ने उड़कर , 
उसे गले लगा लिया , 
रच बस कर जब दोनों गिरे , 
धरा पर , 
सावन आ गया।  

सोंधी सी सुगंध , 
मिट्टी बौरा गयी , 
बादलो ने देखो , 
उसकी झोली भर दी, 
लहलहा उठा , 
तन मन , 
कपोले उसके सीने से , 
फूट पड़ी , 
आलिंगन कर बारिश का , 
देखो ! धरा सज गयी।  

निर्लज्ज , बेवफा 
कितनी देर लगा दी , 
बूँदो तुमने धरा की , 
जान हलक में ला दी ,
आये हो अब तो , 
निहाल कर दो , 
कण कण में समा कर , 
 " मिट्टी " को सोना कर दो।   

Thursday, August 23, 2018

बारिश की बूँदे

ये बारिश की बूँदे कितनी मनचली है , 
देखो ! कैसे बेबाक और बेख़ौफ़ बरसती है , 
इसको चिंता नहीं धरा के प्यास की , 
देखो, ये आसमान में  कैसे अठखेलियाँ खेलती है।  

इन्हे न अपना घर छोड़ने का मलाल , 
वो मखमली , मुलायम और रूई की फाँक जैसा आराम ,
बिना रोक टोक और बंधन के , 
जी सकती थी , फिर क्यों नहीं समझती ये नादान।  

धम्म से गिरती है कठोर धरातल पर , 
दर्द से उछलती है कई बार , 
फिर जैसे समझौता कर लेती है , 
धरा से मिलकर जैसे अपना अस्तित्व समाहित कर देती है।  

धरातल मिलकर बूँद के साथ , 
अपने को सजा लेता है , 
प्रंशसा फिर उसी की होती है , 
"बूँद " की किस्मत में तो सिर्फ त्याग होता है।  

नासमझ धरातल फिर भी अपनी अकड़ में रहता है , 
जैसे इसको अपना अधिकार समझता है , 
मगर उसका ये गुरूर तब टूटता है , 
वो "बूँद " जब सैलाब बनता है।  



Friday, July 15, 2016

बादल




आसमां के लुटेरे बादल - श्याम श्वेत ये बादल !
बरसते अपनी मनमर्जी से , उमड़ घुमड़ शोर करते बादल !!

अपने में समेटे बूँदों को , धरा को तरसाते बादल !
आँख मिचौली सूरज के साथ करते हैं ये बादल !!

बरसने से पहले खूब बचपना करते बादल !
नियति को मंजूर करने से पहले खूब अठखेलियां करते बादल !!

आज यहाँ , कल कहाँ - पूरी धरती का चक्कर लगाते ये बादल !
किसी के लिए वरदान , किसी के लिए सैलाब लाते ये बादल !! 

करने दो शैतानियाँ जरा , धरा में समाने के लिए ही जन्मे हैं ये बादल !
बारिश की बूँदे बनकर कितना कुछ दे जाते हैं ये बादल !!