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Thursday, February 27, 2025

गंगा जी

 



 

गंगा तट पर बैठ समझ रहा जीवन सार ,

नन्ही धार बन नदिया , पहुंचे सागर द्वार ,

बहने के सफ़र में करती सबका कल्याण ,

"गंगा " से "गंगा जी " बनने का यही विस्तार। 

 

निकली छल-छल, कल-कल हिमालय से ,

करती पुनीत पावन पहुँचती हरिद्वार ,

गति मंद स्थिर बहकर कानपूर से ,

मिलती यमुना से प्रयागराज त्रिवेणी घाट। 

 

2525 किलोमीटर का सफर ,

न जाने कितने गाँव , कितने शहर ,

सदियों से बह रही है "गंगा" ,

इतिहास की इक अमूल्य धरोहर। 

 

सबको मिलाती , अपने में घुलाती ,

बह रहा अविरल प्रवाह निरंतर,

जल ही जीवन , जल ही अमृत  ,

"माँ गंगे " बहती रहो युग पर्यन्त।

Friday, July 12, 2019

जल



सलिल कहो या पय ,
मेघपुष्प या पानी, 
वारि कहो या नीर , 
तोय या उदक , 
मैं जल हूँ , जीवन हूँ।  

स्वादहीन , 
गंधरहित , 
आकारविहीन , 
पारदर्शी महीन, 
मैं जल हूँ , जीवन हूँ।  

बूँदे बनूँ तो बारिश , 
धार बनूँ तो नदियाँ , 
शांत पड़ा रहूँ  तो सागर , 
उमड़ घुमड़ में बादल, 
मैं जल हूँ , जीवन हूँ।  

प्यासे के लिए अमृत , 
धरा के लिए सखा , 
सागर से लिपटा , 
शिखरों में फैला स्वेत धवल , 
मैं जल हूँ , जीवन हूँ।  

सर्वत्र , 
सर्वव्यापी , 
स्वछंद , 
अनमोल मगर सीमित हूँ , 
मैं जल हूँ , जीवन हूँ।  

संभाल सको ,
तो जीवन हूँ , 
न संभला , 
तो प्रलय हूँ , 
मैं जल हूँ , जीवन हूँ।

Friday, July 5, 2019

बारिश की पहली बूँद

बारिश की पहली बूँद 
जब धरा पर गिरी , 
सूखी मिट्टी ने उड़कर , 
उसे गले लगा लिया , 
रच बस कर जब दोनों गिरे , 
धरा पर , 
सावन आ गया।  

सोंधी सी सुगंध , 
मिट्टी बौरा गयी , 
बादलो ने देखो , 
उसकी झोली भर दी, 
लहलहा उठा , 
तन मन , 
कपोले उसके सीने से , 
फूट पड़ी , 
आलिंगन कर बारिश का , 
देखो ! धरा सज गयी।  

निर्लज्ज , बेवफा 
कितनी देर लगा दी , 
बूँदो तुमने धरा की , 
जान हलक में ला दी ,
आये हो अब तो , 
निहाल कर दो , 
कण कण में समा कर , 
 " मिट्टी " को सोना कर दो।