निकल पड़ा हूँ लेखन यात्रा में , लिए शब्दों का पिटारा ! भावनाओ की स्याही हैं , कलम ही मेरा सहारा !!
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Sunday, August 18, 2019
Thursday, August 2, 2018
रोज़ लिखता हूँ
जो थोड़े से शब्द है ,
उनको पिरोकर कुछ लिख लेता हूँ ,
भावनाओ की स्याही से ,
कागज पर कभी आँसू , कभी मुस्कान रख देता हूँ।
उड़ते रहते है ये कागज मेरे कमरे में ,
मैं भी जानबूझकर इन्हे खुला रखता हूँ ,
किसी पन्ने से आँसू टपकते है ,
किसी पन्ने पर कहकहे लगते है।
शायद ज़िन्दगी भी तो ऐसी ही है ,
जहाँ आँसू और हँसी साथ साथ चलते है ,
कुछ यादों की गठरी , कुछ ख्वाब कल के ,
आज में हम यहीं तो जीते है।
कुछ कवितायेँ , कुछ कहानियाँ रचता रहता हूँ
शब्दों की दुनिया में "फ़कीर " जैसा लगता हूँ ,
सीखता रहता हूँ शब्दों को करीने से सजाना ,
कभी तो बोल उठेंगे "मेरे शब्द" भी - इस उम्मीद में रोज़ लिखता हूँ।
Saturday, July 8, 2017
चलो , आज कुछ लिखते हैं
चलो , आज कुछ लिखते हैं ,
आपबीती या कोरी कल्पना ,
कुछ प्रेरणादायी या फिर ,
कुछ चुभने वाला ही लिखते हैं।
चलो , आज कुछ शब्दों को प्राण देते हैं ,
गीत बने या कहानी ,
कविता बने या न बने ,
अपनी भावनाओ को आकार देते हैं,
चलो , आज कुछ लिखते हैं।
किसी को अच्छा लगे , न लगे ,
तुकबंदी बने या न बने ,
खत्म हो या न हो ,
कुछ शब्दों से अपने जज्बात बयां करते हैं ,
चलो , आज कुछ लिखते हैं।
जो दिख रहा , जो घट रहा ,
अच्छा हो या बुरा ,
इसकी फिक्र दुसरो पर छोड़ते हैं ,
शब्दों से आज खेलते हैं ,
चलो , आज कुछ लिखते हैं।
पंकितयाँ बने या न बने ,
अर्थ कुछ बने या न बने ,
व्याकरण की चिंता किये बगैर ,
आज कुछ अपने लिए लिखते हैं ,
चलो , आज कुछ लिखते हैं।
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