Wednesday, January 31, 2024

दुविधा

 

दुविधा बड़ी है ,

राहें ज़िन्दगी की ,

क्या छोड़ू,क्या समेटू ,

समेटू तो कुछ जरूर छूटे ,

छोड़ू कुछ तो बुरा लगे ,

समेटने - छोड़ने के क्रम में ,

दिमाग हमेशा उलझन में रहे ,

उधेड़बुन कदम दर कदम ,

न कुछ छूटे,न कुछ समेटे ,

गुजर रहा है कारवाँ ,

हम गुदड़ी कंधे में बोके,

चल रहे है हक्के -बक्के,

हर मंजर पर आँखे फाड़े ,

सुस्ताते कभी, कभी तेज भागे ,

किसी को टंगड़ी दे ,

आगे बढ़ते ,

पीछे से कोई टाँग खींचे ,

क्या चाहिए ,

कितना चाहिये ,

क्यों चाहिये ,

परवाह कहाँ है ,

बोझ काँधे का खुद बढ़ाते ,

हाँफते , लड़खड़ाते ,

खिसियानी सी मुस्कान फेरे ,

असमंजस्य में दो नन्हे कदम ,

कभी आगे बढ़े ,

कभी पीछे को खिसके ,

किंककर्तव्यविमूढ़ मस्तिष्क,

बस हार -जीत की सोचे,

दिल की कौन सुने अंधड़ में,

            वो इक पल सुकून को तरसे,

समय की चाल बराबर ,

परवाह कहाँ उसे ,

कौन आगे बढ़ा ,

           और कौन पीछे छूटे।    

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