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Tuesday, June 9, 2026

ए आई और हम

 कुछ ऐसा लिखो आनन्द अब , 

जो ए आई भी न लिख पाये , 

कुछ ऐसे सवाल बूझो , 

जो गूगल के पास भी न हो , 

नया कुछ ही अंतर पैदा करेगा , 

ए आई और तुम्हारी लेखनी में , 

अभी भी बहुत उम्मीद बची है , 

ए आई वही लिखेगा , 

जो अब तक लिखा जा चुका है , 

गूगल अब भी उन्ही प्रश्नों का उत्तर देगा , 

जो हल किये जा चुके है कभी , 

नया लिखने के लिये अभी भी बहुत है , 

और हजारों सवाल अब भी अनुत्तरित है , 

और यही अभी की "उम्मीद " है , 

ये उम्मीद और सम्भावना बहुत बड़ी है, 

इंसानो की बुद्धि और रचनात्मकता की , 

अभी तक तो कोई सीमा नहीं हैं , 

मजे की बात तो ये है " आनन्द " 

ए आई और गूगल सब , 

उसी करामाती ढाई सौ ग्राम के  , 

मस्तिष्क की बानगी भर है, 

ए आई अभी एक जमा एक को दो ही कहेगा , 

एक जमा एक को ग्यारह करने में अभी बहुत देर हैं।  

Saturday, August 31, 2024

क्या लिखूँ ?

 

 

शब्दों में "बेचैनी" है ,

भावनाओं में "उबाल",

कागज़ "मलिन " हो गया ,

कलम कहाँ करे "गुहार " ।

 

अनर्गल "प्रलाप " चहुँओर है ,

वर्चुअल दुनियाँ में भयंकर "शोर" है ,

सब्र , संयम अब "बीती" बात है ,

"विरोध" का ही जोर है। 

 

अहं का "वहम " जारी है ,

"गुरु " पर गूगल भारी है ,

"भूख" रोटी तक सीमित नहीं अब ,

इतनी "भागदौड़" -जेब खाली है। 

 

"शॉर्टकट" सब ढूँढ रहे ,

मेहनत में "मगज़मारी" है ,

"दिखावटी" बाज़ार अटा पड़ा है ,

"शोशेबाज़ी"- हर जगह जारी है। 

 

हुक्मरान "स्वार्थी" हो चुके ,

जनता -जनार्दन के हाल "बेहाल",

"विश्वास" तीतर हो चुका है ,

लिखे कलम क्या - "ए आई" नया बवाल। 

 


Wednesday, January 31, 2024

दुविधा

 

दुविधा बड़ी है ,

राहें ज़िन्दगी की ,

क्या छोड़ू,क्या समेटू ,

समेटू तो कुछ जरूर छूटे ,

छोड़ू कुछ तो बुरा लगे ,

समेटने - छोड़ने के क्रम में ,

दिमाग हमेशा उलझन में रहे ,

उधेड़बुन कदम दर कदम ,

न कुछ छूटे,न कुछ समेटे ,

गुजर रहा है कारवाँ ,

हम गुदड़ी कंधे में बोके,

चल रहे है हक्के -बक्के,

हर मंजर पर आँखे फाड़े ,

सुस्ताते कभी, कभी तेज भागे ,

किसी को टंगड़ी दे ,

आगे बढ़ते ,

पीछे से कोई टाँग खींचे ,

क्या चाहिए ,

कितना चाहिये ,

क्यों चाहिये ,

परवाह कहाँ है ,

बोझ काँधे का खुद बढ़ाते ,

हाँफते , लड़खड़ाते ,

खिसियानी सी मुस्कान फेरे ,

असमंजस्य में दो नन्हे कदम ,

कभी आगे बढ़े ,

कभी पीछे को खिसके ,

किंककर्तव्यविमूढ़ मस्तिष्क,

बस हार -जीत की सोचे,

दिल की कौन सुने अंधड़ में,

            वो इक पल सुकून को तरसे,

समय की चाल बराबर ,

परवाह कहाँ उसे ,

कौन आगे बढ़ा ,

           और कौन पीछे छूटे।