Showing posts with label doubt. Show all posts
Showing posts with label doubt. Show all posts

Wednesday, January 31, 2024

दुविधा

 

दुविधा बड़ी है ,

राहें ज़िन्दगी की ,

क्या छोड़ू,क्या समेटू ,

समेटू तो कुछ जरूर छूटे ,

छोड़ू कुछ तो बुरा लगे ,

समेटने - छोड़ने के क्रम में ,

दिमाग हमेशा उलझन में रहे ,

उधेड़बुन कदम दर कदम ,

न कुछ छूटे,न कुछ समेटे ,

गुजर रहा है कारवाँ ,

हम गुदड़ी कंधे में बोके,

चल रहे है हक्के -बक्के,

हर मंजर पर आँखे फाड़े ,

सुस्ताते कभी, कभी तेज भागे ,

किसी को टंगड़ी दे ,

आगे बढ़ते ,

पीछे से कोई टाँग खींचे ,

क्या चाहिए ,

कितना चाहिये ,

क्यों चाहिये ,

परवाह कहाँ है ,

बोझ काँधे का खुद बढ़ाते ,

हाँफते , लड़खड़ाते ,

खिसियानी सी मुस्कान फेरे ,

असमंजस्य में दो नन्हे कदम ,

कभी आगे बढ़े ,

कभी पीछे को खिसके ,

किंककर्तव्यविमूढ़ मस्तिष्क,

बस हार -जीत की सोचे,

दिल की कौन सुने अंधड़ में,

            वो इक पल सुकून को तरसे,

समय की चाल बराबर ,

परवाह कहाँ उसे ,

कौन आगे बढ़ा ,

           और कौन पीछे छूटे।    

Sunday, January 6, 2019

कैसा दौर?




काल खंड का ये कैसा दौर आया ? 
सच पर झूठ की संगीन छाया,
 छल प्रपंच और मक्कारी ,
 सीधे सादे लोगो को ढोंगियों ने भरमाया।
  
पिस रहा मानस अपने बोझ तले ही ,
 इच्छाओ की अनंत पराकाष्ठा , 
लगी हुई है दौड़ भयंकर ,
भस्मासुर बन शिव को तलाश रहा।

नैतिकता को तिलांजलि देकर ,
मानवता को दंश लग रहा , 
स्वार्थ की महिमा ऐसी चढ़ रही , 
खुद के अस्तित्व पर संकट छा रहा।

असत्य , सत्य को दबा रहा , 
ढोंगी और प्रपंचियों का बोलबाला , 
आभासी दुनिया के मकड़जाल में , 
पिस रहा सहज मनुष्य भोलाभाला।

 प्रकृति के साथ खेल भयंकर , 
कुरेद डाला उसका  मन , 
अट्टहास हो रहा अट्टालिकाओं से, 
जर जर हो गया तन।

रिश्ते सब मर्यादा लांघ चुके , 
दर्द से अब कोई नहीं पसीजता , 
मानवता अब किताबी रह गयी , 
आँखों से अब "सच्चा " आँसू नहीं आता।

भ्रमित सा चौराहे पर खड़ा , 
कोई रास्ता नहीं सूझ रहा , 
जिधर देखी भीड़ - चल दिया , 
भेड़चाल में "मानुस " जी रहा।

 गवाही देगा जर्रा जर्रा , 
कण कण सच उगलेगा , 
खुदेगी जब मिटटी कालांतर , 

परत दर परत "काला  सच" उभरेगा।    

Monday, December 10, 2018

प्रश्न



अब स्वर्ग से नहीं उतरेंगे
फरिश्ते ,
और न पाताल से जन्मेंगे
राक्षस,
इसी पृथ्वी पर ,
धरती और आकाश के बीच
जन्मेंगे ,
पनपेंगे ,
और ,
नियति को पाएंगे ,
सब ,
इर्द गिर्द ,
मौजूद रहेंगे ,
हर वक्त ,
फरिश्ते ,
और राक्षस ।

नजर पैनी चाहिए ,
जो पहचान सके ,
कौन फरिश्ता
और कौन राक्षस ,
न रंग में भेद होगा ,
न फ़रिश्तो के पर होंगे ,
राक्षस अट्टहास नहीं करेंगे ,
बड़ी मुश्किल ,
पहचानने में ,
किसके अंदर छुपा क्या है ,
कौन छुपाये बैठा है खंजर ,
किसकी नीयत क्या है ?
किसी को नहीं खबर ,
मानुष के रूप में ,
फरिश्ता भी है ,
और राक्षस भी। 

तय नहीं है अब
श्वेत वस्त्र में फरिश्ते ही होंगे ,
काले कपड़ो में सिर्फ ,
राक्षस ही मिलेंगे ,
बदल गयी है दुनिया ,
बदल गया है समाज ,
खुद ही संभल कर ,
चलिए ,
खुद ही पहचानना होगा ,
कौन फरिश्ता ,
और
कौन राक्षस,
कौन दोस्त ,
और ,
कौन दुश्मन। 

हां , मुश्किल है थोड़ा ,
मगर असंभव नहीं ,
खुले रखिये अपने पाँचो इन्द्रियाँ ,
संकेत मिलेंगे वहीँ,
पहचान जायेंगे आप ,
कौन गलत  ,
और ,
कौन सही।


Saturday, June 9, 2018

कशमकश

माथे पर चिंताओं की लकीरें  क्यों है ?
चेहरे पर ये मायूसी सी क्यों है ?
खोया खोया सा हर शख्स यहाँ , 
बेचैनी का तूफ़ान लिए क्यों है?  

आज़ादी की तमन्ना लिए दिल में , 
हर सांस में घुटन में क्यों है ?
खुद अपनी राह बनाने निकला , 
भीड़ में  शामिल क्यों है ?

सीने में तूफानों से जज्बात , 
सहमा सहमा सा क्यों है ?
रिश्तो में पला बढ़ा , 
रिश्तो से अब चिढ़ क्यों है ?

उसूलो की ताकत , 
हकीकत के धरातल पर तड़पती क्यों है ?
घिरा हुआ है भीड़ से , 
फिर भी अकेला क्यों है ?

कुछ पाने की ख़ुशी नहीं , 
सब कुछ पा लेने की ज़िद्द क्यों है ?
अपनी पहचान बनाने चला था , 
दुसरो के अक्स में अपने को तलाशता क्यों है ?

मेहनत ही सफलता की कुंजी , 
परिश्रम से घबराता क्यों है ?
धैर्य और संयम का पाठ , 
हर मोड़ पर भूलता क्यों है ? 

कशमकश ये कैसी , 
रातो की नींद गायब क्यों है ?
खिलखिलाता चेहरा जिसकी पहचान , 
हर हँसी में दर्द  छलकता क्यों है ? 

कुछ तो बदली है आबो हवा , 
कुछ पानी में जहर है , 
घुट घुट कर सिसक रही ज़िन्दगी , 
ज़िन्दगी को शायद कुछ सुकून की जरुरत है।  

Saturday, December 30, 2017

अन्तर्युद्ध


अंतर्मन की बड़ी दुविधा है ,
किस राह को अब चुनु ?

दिल और दिमाग की जोर आजमाइश है ,
चौराहे में खड़ा अब किस ओर चलूँ ?

आते है जीवन में क्षण ऐसे , पैर ठिठक जाते है
इस राह चलूँ की , उस राह चलूँ। 

भटक रहा मन जीवन पथ पर ,
यक्ष प्रश्न बन कर उभर रहा ,
मरीचिका सा भविष्य सामने ,
मार्ग कौन सा चुनूँ - दिल घबरा रहा। 

मन और मस्तिष्क के इस अन्तर्युद्ध में ,
शरीर बस कटपुतली बन रहा ,
किस राह पर चलूँ अब ,
किंककर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा रहा। 

चलना तो नियति है ,
इसके बिना कहाँ फिर गति है ,
मुझे ही इससे पार पाना होगा ,
जहाँ मन लगे , वहाँ जाना होगा। 

मेरा जीवन मेरी थाती है ,
भूलकर सब , नव प्राण फूँकना होगा ,
चल चलाचल , वैतरणी को ,
खुद ही पार करना होगा।