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Saturday, December 30, 2017

अन्तर्युद्ध


अंतर्मन की बड़ी दुविधा है ,
किस राह को अब चुनु ?

दिल और दिमाग की जोर आजमाइश है ,
चौराहे में खड़ा अब किस ओर चलूँ ?

आते है जीवन में क्षण ऐसे , पैर ठिठक जाते है
इस राह चलूँ की , उस राह चलूँ। 

भटक रहा मन जीवन पथ पर ,
यक्ष प्रश्न बन कर उभर रहा ,
मरीचिका सा भविष्य सामने ,
मार्ग कौन सा चुनूँ - दिल घबरा रहा। 

मन और मस्तिष्क के इस अन्तर्युद्ध में ,
शरीर बस कटपुतली बन रहा ,
किस राह पर चलूँ अब ,
किंककर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा रहा। 

चलना तो नियति है ,
इसके बिना कहाँ फिर गति है ,
मुझे ही इससे पार पाना होगा ,
जहाँ मन लगे , वहाँ जाना होगा। 

मेरा जीवन मेरी थाती है ,
भूलकर सब , नव प्राण फूँकना होगा ,
चल चलाचल , वैतरणी को ,
खुद ही पार करना होगा।  

Monday, October 30, 2017

समाधान



कर वही , 
जो लगे सही , 
दिल की सुन 
दिमाग की नहीं। 

दिमाग 
हिसाब किताब 
करता है , 
और 
दिल , 
ज़िन्दगी के लिए , 
वजह , 
ढूंढता है।  

Monday, April 4, 2016

ख़ुशी और गम



थक गयी ज़िन्दगी भी  मुझे दर्द देते देते !
बोल ही उठी आखिर एक दिन मुझसे !!

“तू चल अब अपने रस्ते , मैं चलती हूँ अपने रस्ते !
परख लिया तुझे बहुत अब , उकता गयी हूँ तुझे  देखकर हर बार हँसते”!!

मैंने फिर मुस्कराते हुए जवाब दिया , “जब भी कभी गुमां हो जाये तुम्हे दर्द किसी को देते देते !
मेरा दरवाजा खुला हैं , तब भी मिलूंगा यू ही हँसते हँसते” !!

ज़िन्दगी ने कहा , " खुश हूँ तेरी ज़िंदादिली देखकर , कुछ माँग ले अपने लिए "!
मैंने कहा ," कुछ देना हैं तो एक काम करना ए - ज़िन्दगी , दर्द उसी को देना जो उसे संभाल सके " !!

"कितनो को तेरे  दर्द के बोझ तले तड़पता देखा हैं !
माफ़ करना तेरा नाम ही बदनाम होता हैं !!

दर्द देती हैं तो मरहम भी देना , मुस्कराते चेहरों को तवज्जो देना !
एक ज़िन्दगी मिली हैं सबको - ज्यादा से ज्यादा खुशियां और कम से कम गम देना”!!