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Thursday, October 9, 2025

जीवन नाव

 

हो जायेंगे मसले हल ,

चिंता से क्या होगा ,

जो करना है वो कर ,

हल कुछ निकल आयेगा। 

 

कमियाँ किसके अंदर नहीं यहाँ ,

कोई भी तो पूर्ण नहीं है ,

जो प्राप्त है , पर्याप्त है ,

प्राप्य के लिये प्रयत्न कर। 

 

आनन्द बाहर नहीं मिलेगा ,

वो तो मन के भीतर है ,

फँसा हुआ मन बाहर ,

बाहर हर जगह कोलाहल है। 

 

कर्म बहुत जरुरी है ,

उसके बिना गति नहीं है ,

कर्मफ़ल में जो मिले ,

स्वीकार कर और आगे बढ़। 

 

जीवन सागर में उतरी नाव है ,

पतवार तेरी ख़ुद के हाथ है ,

कब लगेगी पार " आनन्द "

ये बस ईश्वर के हाथ हैं।  

 

Saturday, December 30, 2017

अन्तर्युद्ध


अंतर्मन की बड़ी दुविधा है ,
किस राह को अब चुनु ?

दिल और दिमाग की जोर आजमाइश है ,
चौराहे में खड़ा अब किस ओर चलूँ ?

आते है जीवन में क्षण ऐसे , पैर ठिठक जाते है
इस राह चलूँ की , उस राह चलूँ। 

भटक रहा मन जीवन पथ पर ,
यक्ष प्रश्न बन कर उभर रहा ,
मरीचिका सा भविष्य सामने ,
मार्ग कौन सा चुनूँ - दिल घबरा रहा। 

मन और मस्तिष्क के इस अन्तर्युद्ध में ,
शरीर बस कटपुतली बन रहा ,
किस राह पर चलूँ अब ,
किंककर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा रहा। 

चलना तो नियति है ,
इसके बिना कहाँ फिर गति है ,
मुझे ही इससे पार पाना होगा ,
जहाँ मन लगे , वहाँ जाना होगा। 

मेरा जीवन मेरी थाती है ,
भूलकर सब , नव प्राण फूँकना होगा ,
चल चलाचल , वैतरणी को ,
खुद ही पार करना होगा।  

Monday, October 30, 2017

समाधान



कर वही , 
जो लगे सही , 
दिल की सुन 
दिमाग की नहीं। 

दिमाग 
हिसाब किताब 
करता है , 
और 
दिल , 
ज़िन्दगी के लिए , 
वजह , 
ढूंढता है।