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Friday, April 18, 2025

क्षमता

 


हम , अधिकतर , 

अपनी क्षमताओं को कमतर आँकते है , 

और जो , अपनी क्षमताओं से ऊपर बढ़कर , 

कार्य कर जाते है , 

वही इतिहास बना जाते है, 


दुर्भाग्य से , अधिकतर , 

किसी भी कारणवश , 

अपनी क्षमताओं का प्रयोग , 

किये बिना ही , 

समस्त जीवन गुजार देते है।  

Thursday, February 15, 2024

बात पते की

 

दादी एक बात कहती थी ,

उस समय समझ नहीं आती थी ,

वो कहती थी - अक्ल और ,

उम्र की भेंट अक्सर नहीं होती ,

जिनकी होती है -वो पार हो जाते है ,

जिनकी नहीं होती वो बस पछताते है ,

बात सीधी और सरल सी थी ,

अपने में पूरा सार समेटे थी ,

जीवन का सारा खेल ही ,

अक्ल और उम्र पर टिका है ,

सही उम्र पर अक्ल आ जाए ,

तो पूरा जीवन सफल हो जाता है ,

वर्ना फिर जीवन की मथनी में ,

वो पिसता चला जाता है,

दादी एक बात कहती थी ,

उस समय समझ कहाँ आती थी ,

वो कहती थी -अभी समझ नहीं आयेगा ,

जब आयेगा -  बहुत देर हो चुकी होगी ,

और ये लाख टके की बात थी,

अब सोचों तो कितना सच कहती थी। 

Wednesday, January 31, 2024

दुविधा

 

दुविधा बड़ी है ,

राहें ज़िन्दगी की ,

क्या छोड़ू,क्या समेटू ,

समेटू तो कुछ जरूर छूटे ,

छोड़ू कुछ तो बुरा लगे ,

समेटने - छोड़ने के क्रम में ,

दिमाग हमेशा उलझन में रहे ,

उधेड़बुन कदम दर कदम ,

न कुछ छूटे,न कुछ समेटे ,

गुजर रहा है कारवाँ ,

हम गुदड़ी कंधे में बोके,

चल रहे है हक्के -बक्के,

हर मंजर पर आँखे फाड़े ,

सुस्ताते कभी, कभी तेज भागे ,

किसी को टंगड़ी दे ,

आगे बढ़ते ,

पीछे से कोई टाँग खींचे ,

क्या चाहिए ,

कितना चाहिये ,

क्यों चाहिये ,

परवाह कहाँ है ,

बोझ काँधे का खुद बढ़ाते ,

हाँफते , लड़खड़ाते ,

खिसियानी सी मुस्कान फेरे ,

असमंजस्य में दो नन्हे कदम ,

कभी आगे बढ़े ,

कभी पीछे को खिसके ,

किंककर्तव्यविमूढ़ मस्तिष्क,

बस हार -जीत की सोचे,

दिल की कौन सुने अंधड़ में,

            वो इक पल सुकून को तरसे,

समय की चाल बराबर ,

परवाह कहाँ उसे ,

कौन आगे बढ़ा ,

           और कौन पीछे छूटे।