हम , अधिकतर ,
अपनी क्षमताओं को कमतर आँकते है ,
और जो , अपनी क्षमताओं से ऊपर बढ़कर ,
कार्य कर जाते है ,
वही इतिहास बना जाते है,
दुर्भाग्य से , अधिकतर ,
किसी भी कारणवश ,
अपनी क्षमताओं का प्रयोग ,
किये बिना ही ,
समस्त जीवन गुजार देते है।
निकल पड़ा हूँ लेखन यात्रा में , लिए शब्दों का पिटारा ! भावनाओ की स्याही हैं , कलम ही मेरा सहारा !!
हम , अधिकतर ,
अपनी क्षमताओं को कमतर आँकते है ,
और जो , अपनी क्षमताओं से ऊपर बढ़कर ,
कार्य कर जाते है ,
वही इतिहास बना जाते है,
दुर्भाग्य से , अधिकतर ,
किसी भी कारणवश ,
अपनी क्षमताओं का प्रयोग ,
किये बिना ही ,
समस्त जीवन गुजार देते है।
दादी एक बात कहती थी ,
उस समय समझ नहीं आती थी ,
वो कहती थी - अक्ल और ,
उम्र की भेंट अक्सर नहीं होती ,
जिनकी होती है -वो पार हो जाते है ,
जिनकी नहीं होती वो बस पछताते है ,
बात सीधी और सरल सी थी ,
अपने में पूरा सार समेटे थी ,
जीवन का सारा खेल ही ,
अक्ल और उम्र पर टिका है ,
सही उम्र पर अक्ल आ जाए ,
तो पूरा जीवन सफल हो जाता है ,
वर्ना फिर जीवन की मथनी में ,
वो पिसता चला जाता है,
दादी एक बात कहती थी ,
उस समय समझ कहाँ आती थी ,
वो कहती थी -अभी समझ नहीं आयेगा ,
जब आयेगा - बहुत
देर हो चुकी होगी ,
और ये लाख टके की बात थी,
अब सोचों तो कितना सच कहती थी।
दुविधा बड़ी है ,
राहें ज़िन्दगी की ,
क्या छोड़ू,क्या समेटू ,
समेटू तो कुछ जरूर छूटे ,
छोड़ू कुछ तो बुरा लगे ,
समेटने - छोड़ने के क्रम में ,
दिमाग हमेशा उलझन में रहे ,
उधेड़बुन कदम दर कदम ,
न कुछ छूटे,न कुछ समेटे ,
गुजर रहा है कारवाँ ,
हम गुदड़ी कंधे में बोके,
चल रहे है हक्के -बक्के,
हर मंजर पर आँखे फाड़े ,
सुस्ताते कभी, कभी तेज भागे ,
किसी को टंगड़ी दे ,
आगे बढ़ते ,
पीछे से कोई टाँग खींचे ,
क्या चाहिए ,
कितना चाहिये ,
क्यों चाहिये ,
परवाह कहाँ है ,
बोझ काँधे का खुद बढ़ाते ,
हाँफते , लड़खड़ाते ,
खिसियानी सी मुस्कान फेरे ,
असमंजस्य में दो नन्हे कदम ,
कभी आगे बढ़े ,
कभी पीछे को खिसके ,
किंककर्तव्यविमूढ़ मस्तिष्क,
बस हार -जीत की सोचे,
दिल की कौन सुने अंधड़ में,
वो इक पल सुकून को तरसे,
समय की चाल बराबर ,
परवाह कहाँ उसे ,
कौन आगे बढ़ा ,
और कौन पीछे छूटे।